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Siddharthnagar News: फिर उदास हुई विकास के लिए व्याकुल बुद्धनगरी
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Mon, 02 Feb 2026 12:45 AM IST
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कपिलवस्तु-पिपरहवा
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- आम बजट में पूर्वोत्तर के राज्यों में बुद्ध सर्किट विकासित करने की योजना शामिल, कुशीनगर, कपिलवस्तु को मिली निराशा
- बुद्ध सर्किट का बजट उत्तर-पूर्व की ओर मुड़ा, यूपी-बिहार के मूल स्थल छूटे
सिद्धार्थनगर। केंद्रीय बजट 2026-27 में बुद्ध सर्किट का फोकस बदला नजर आया। उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए बड़े विजन की घोषणा तो हुई, लेकिन बुद्ध की जीवन-यात्रा के केंद्र कपिलवस्तु और पिपरहवा बजट भाषण में कहीं नजर नहीं आए। ऐसे में बजट से विकास की आस लगाए इन क्षेत्रों को काफी झटका लगा है। वहीं, बुद्ध की जन्मभूमि होने और उनके बचपन से जुड़े होने के बाद भी सिद्धार्थनगर, कुशीनगर और श्रावस्ती जैसे जिलों को नए सर्किट में शामिल न किए जाने से क्षेत्र के लोगों में उदासी है।
इस बार बौद्ध सर्किट को भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के विकास के जिस मॉडल के रूप में पेश किया गया है, उसके तहत अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, असम, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में बौद्ध विरासत, मठों और मंदिरों के संरक्षण के साथ पर्यटन को बढ़ावा देने का प्रस्ताव है। इससे सिद्धार्थनगर, कुशीनगर, श्रावस्ती जैसे जिले के लोगों इस मायने में निराशा हाथ लगी कि केंद्रीय बजट का अंश उनके हिस्से में आने से वंचित रह गया।
इतिहासकार डॉ. शरदेंदु त्रिपाठी कहते हैं कि बौद्ध सर्किट भगवान बुद्ध के जीवन की यात्रा से जुड़ा हुआ है। इस क्रम में उत्तर प्रदेश में कुशीनगर (महापरिनिर्वाण), वाराणसी/सारनाथ (प्रथम उपदेश), श्रावस्ती (प्रवचन), सिद्धार्थनगर/कपिलवस्तु (बचपन), कौशाम्बी और फर्रुखाबाद/संकिसा, बिहार में बोधगया, राजगीर और वैशाली, नेपाल में लुंबिनी को प्रमुख पड़ाव माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन स्थलों की आपसी कड़ी ही बौद्ध सर्किट की पहचान है और इसमें कपिलवस्तु की भूमिका केंद्रीय मानी जाती है।
जिले के बुद्धिजीवी कहते हैं कि प्रदेश सरकार लगातार बुद्ध सर्किट को अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के रूप में प्रस्तुत कर रही है। सड़क, सौंदर्यीकरण, लाइटिंग, पर्यटन सुविधाएं और प्रचार के लिए बजट का प्रावधान किया जा रहा है, लेकिन यह जिला सर्किट का हिस्सा होकर भी अपेक्षित लाभ से वंचित है।
उम्मीद थी कि केंद्र सरकार के बजट में इस सर्किट के लिए बूस्टर पैकेज मिलेगा और बुद्ध पर्यटन के जरिए विकास को नई रफ्तार मिलेगी। लेकिन केंद्र ने पूर्वोत्तर राज्यों की तरफ रुख मोड़कर निराश किया। इस घोषणा में बौद्ध सर्किट की आत्मा माने जाने वाले कपिलवस्तु और पिपरहवा का उल्लेख न होना सिद्धार्थनगर सहित पूरे बौद्ध सर्किट से जुड़े क्षेत्रों को कचोट रहा है।
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घोषणाओं से आगे, क्रियान्वयन की जरूरत
- पिछले वर्षों में साइनज, सूचना केंद्र, पर्यटक सुविधाएं, इंटरप्रिटेशन सेंटर, गाइड ट्रेनिंग और होम-स्टे जैसे प्रस्ताव सामने आए। इनमें से कई योजनाएं अब भी प्रभावी क्रियान्वयन की प्रतीक्षा में हैं। पिपरहवा जैसे ऐतिहासिक स्थल पर अब तक विश्वस्तरीय म्यूजियम और इंटरएक्टिव सेंटर विकसित नहीं हो सका है।
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भारत-नेपाल बौद्ध विरासत का सेतु बन सकता है सिद्धार्थनगर
लुंबिनी से निकटता सिद्धार्थनगर की बड़ी ताकत मानी जाती है। भारत-नेपाल संयुक्त बौद्ध टूर पैकेज, इमीग्रेशन सुविधा, सूचना केंद्र और ट्रांसपोर्ट लिंक पर केंद्रित निवेश से यह जिला अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों का प्रमुख प्रवेश द्वार बन सकता है।
शिक्षाविद डॉ. नरसिंह त्रिपाठी का कहना है कि सिद्धार्थनगर वर्तमान में बड़ी संख्या में पर्यटकों के लिए ट्रांजिट पॉइंट है। सही इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रचार और पैकेजिंग के जरिये इसे पूर्ण पर्यटन गंतव्य में बदला जा सकता है।
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रोजगार और स्थानीय विकास की उम्मीद
- सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के डॉ. प्रदीप पांडेय के अनुसार, बौद्ध सर्किट का वास्तविक लाभ तभी दिखेगा जब इससे स्थानीय युवाओं को सीधा रोजगार मिलेगा। गाइड ट्रेनिंग, होम-स्टे, होटल, टैक्सी सेवा और हस्तशिल्प को एकीकृत मॉडल में विकसित करने की आवश्यकता है।
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कोट
बौद्ध सर्किट के माध्यम से उत्तर-पूर्वी राज्यों के विकास का जो मॉडल बजट में प्रस्तुत किया गया है, उसी के आधार पर सिद्धार्थनगर, विशेषकर कपिलवस्तु की परियोजनाओं को भी गति दी जा सकती है। इससे प्रदेश दर्शन योजना को आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा।
- प्रिया सिंह, पर्यटन अधिकारी, सिद्धार्थनगर
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- बुद्ध सर्किट का बजट उत्तर-पूर्व की ओर मुड़ा, यूपी-बिहार के मूल स्थल छूटे
सिद्धार्थनगर। केंद्रीय बजट 2026-27 में बुद्ध सर्किट का फोकस बदला नजर आया। उत्तर-पूर्वी राज्यों के लिए बड़े विजन की घोषणा तो हुई, लेकिन बुद्ध की जीवन-यात्रा के केंद्र कपिलवस्तु और पिपरहवा बजट भाषण में कहीं नजर नहीं आए। ऐसे में बजट से विकास की आस लगाए इन क्षेत्रों को काफी झटका लगा है। वहीं, बुद्ध की जन्मभूमि होने और उनके बचपन से जुड़े होने के बाद भी सिद्धार्थनगर, कुशीनगर और श्रावस्ती जैसे जिलों को नए सर्किट में शामिल न किए जाने से क्षेत्र के लोगों में उदासी है।
इस बार बौद्ध सर्किट को भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के विकास के जिस मॉडल के रूप में पेश किया गया है, उसके तहत अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, असम, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में बौद्ध विरासत, मठों और मंदिरों के संरक्षण के साथ पर्यटन को बढ़ावा देने का प्रस्ताव है। इससे सिद्धार्थनगर, कुशीनगर, श्रावस्ती जैसे जिले के लोगों इस मायने में निराशा हाथ लगी कि केंद्रीय बजट का अंश उनके हिस्से में आने से वंचित रह गया।
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इतिहासकार डॉ. शरदेंदु त्रिपाठी कहते हैं कि बौद्ध सर्किट भगवान बुद्ध के जीवन की यात्रा से जुड़ा हुआ है। इस क्रम में उत्तर प्रदेश में कुशीनगर (महापरिनिर्वाण), वाराणसी/सारनाथ (प्रथम उपदेश), श्रावस्ती (प्रवचन), सिद्धार्थनगर/कपिलवस्तु (बचपन), कौशाम्बी और फर्रुखाबाद/संकिसा, बिहार में बोधगया, राजगीर और वैशाली, नेपाल में लुंबिनी को प्रमुख पड़ाव माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन स्थलों की आपसी कड़ी ही बौद्ध सर्किट की पहचान है और इसमें कपिलवस्तु की भूमिका केंद्रीय मानी जाती है।
जिले के बुद्धिजीवी कहते हैं कि प्रदेश सरकार लगातार बुद्ध सर्किट को अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के रूप में प्रस्तुत कर रही है। सड़क, सौंदर्यीकरण, लाइटिंग, पर्यटन सुविधाएं और प्रचार के लिए बजट का प्रावधान किया जा रहा है, लेकिन यह जिला सर्किट का हिस्सा होकर भी अपेक्षित लाभ से वंचित है।
उम्मीद थी कि केंद्र सरकार के बजट में इस सर्किट के लिए बूस्टर पैकेज मिलेगा और बुद्ध पर्यटन के जरिए विकास को नई रफ्तार मिलेगी। लेकिन केंद्र ने पूर्वोत्तर राज्यों की तरफ रुख मोड़कर निराश किया। इस घोषणा में बौद्ध सर्किट की आत्मा माने जाने वाले कपिलवस्तु और पिपरहवा का उल्लेख न होना सिद्धार्थनगर सहित पूरे बौद्ध सर्किट से जुड़े क्षेत्रों को कचोट रहा है।
घोषणाओं से आगे, क्रियान्वयन की जरूरत
- पिछले वर्षों में साइनज, सूचना केंद्र, पर्यटक सुविधाएं, इंटरप्रिटेशन सेंटर, गाइड ट्रेनिंग और होम-स्टे जैसे प्रस्ताव सामने आए। इनमें से कई योजनाएं अब भी प्रभावी क्रियान्वयन की प्रतीक्षा में हैं। पिपरहवा जैसे ऐतिहासिक स्थल पर अब तक विश्वस्तरीय म्यूजियम और इंटरएक्टिव सेंटर विकसित नहीं हो सका है।
भारत-नेपाल बौद्ध विरासत का सेतु बन सकता है सिद्धार्थनगर
लुंबिनी से निकटता सिद्धार्थनगर की बड़ी ताकत मानी जाती है। भारत-नेपाल संयुक्त बौद्ध टूर पैकेज, इमीग्रेशन सुविधा, सूचना केंद्र और ट्रांसपोर्ट लिंक पर केंद्रित निवेश से यह जिला अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों का प्रमुख प्रवेश द्वार बन सकता है।
शिक्षाविद डॉ. नरसिंह त्रिपाठी का कहना है कि सिद्धार्थनगर वर्तमान में बड़ी संख्या में पर्यटकों के लिए ट्रांजिट पॉइंट है। सही इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रचार और पैकेजिंग के जरिये इसे पूर्ण पर्यटन गंतव्य में बदला जा सकता है।
रोजगार और स्थानीय विकास की उम्मीद
- सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के डॉ. प्रदीप पांडेय के अनुसार, बौद्ध सर्किट का वास्तविक लाभ तभी दिखेगा जब इससे स्थानीय युवाओं को सीधा रोजगार मिलेगा। गाइड ट्रेनिंग, होम-स्टे, होटल, टैक्सी सेवा और हस्तशिल्प को एकीकृत मॉडल में विकसित करने की आवश्यकता है।
कोट
बौद्ध सर्किट के माध्यम से उत्तर-पूर्वी राज्यों के विकास का जो मॉडल बजट में प्रस्तुत किया गया है, उसी के आधार पर सिद्धार्थनगर, विशेषकर कपिलवस्तु की परियोजनाओं को भी गति दी जा सकती है। इससे प्रदेश दर्शन योजना को आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा।
- प्रिया सिंह, पर्यटन अधिकारी, सिद्धार्थनगर
