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25 दिन-25 कहानियां: काशी में गंगा तो उत्तरवाहिनी हुईं, सभ्यता दक्षिणवर्ती ही चली; सड़कों-गलियों का ऐसा हाल

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Wed, 20 May 2026 10:53 AM IST
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सार

Varanasi News: बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग के अध्यक्ष  प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार ने कहा कि बीते 25-30 वर्षों में काल चक्र बहुत तेजी से घूमा है। शहर की सड़कें चौड़ीं होती गईं तो बहुधा गलियां पिचकती जा रही हैं। पुरातत्व भी गवाही देते हैं कि पहली आदिम पुरातन काशी तो राजघाट के पास ही बसी थी। अब जाओ तो प्राचीन काशी का पता नहीं लेकिन निखरता-सवंरता काशी स्टेशन दिख जाएगा।

Ganges flows northward—yet civilization has moved southward such is state of roads and lanes Kashi
प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार। - फोटो : संवाद
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विस्तार

Varanasi News: चीन काशी का ‘इसिपत्तन’, मृगदायवन जो आज का सारनाथ है कभी ज्ञान का केंद्र था। अब ज्ञान, तीर्थ और पर्यटन तीनों का संगम है। बिहार से विहार करते आये भगवान बुद्ध की पांच शिष्यों पर पहली ज्ञान वर्षा हुई। तब काशी में दूसरी ओर भद्रवन या भदैनी, हरिकेसवन या जंगमबाड़ी, दारुवन (हरतीरथ के निकट दारानगर), अशोकवन (नीचीबाग) जैसे कई भव्य वन उपवनों का हरा-भरा नेटवर्क था। तब से ढाई हजार साल बीत गए मगर, पिछले 25-30 वर्षों में काल चक्र बहुत तेज घूमा है। शहर की सड़कें चौड़ी होती चली जा रही हैं तो बहुधा गलियां पिचकती जा रहीं। 

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कूचों-घाटों के आन-बान-शान मंदिर, मूर्तियां और स्थानीय दुकान पहले से काफी आराम में हैं। पुरातत्व भी गवाही देते हैं कि पहली आदिम पुरातन काशी तो राजघाट के पास ही बसी थी। गंगा भले ही यहां उत्तरवाहिनी हुईं हो मगर सभ्यता दक्षिणवर्ती होती जा रही है। वहां अब जाओ तो प्राचीन काशी नहीं निखरता-संवरता काशी स्टेशन दिख जाएगा। 
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वहीं हजारों साल पुरानी पुरानिधियां जो काशी की प्राचीनता को उजागर कर सकती हैं, यहीं की मिट्टी में हैं। क्या, काशी एक खोया-पाया केंद्र सा बर्ताव कर रही है? तब रिक्शों से भी इस शहर में निर्बाध आवाजाही हो जाती थी लेकिन आज वो आनंद लेने के लिए वीवीआईपी के रूप में आना होगा। 25 साल के बाद जमीन पर चलने वाला शहर हवाई पुलों पर दौड़ रहा और अब केबल कार से हवा में उड़ाने को तैयार है। 

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रिंग रोड, विशाल स्वर्वेद मंदिर, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम काशीवासियों के लिए नया है। लहरतारा में महान संत कबीर की जन्म स्थली की पहचान भी अब दूर से ही हो जाती है। आज दिख रहा विशाल और भव्य मंदिर तब नहीं था। 

सीरगोवर्धन पुर में संत शिरोमणि श्री गुरु रविदास जन्मस्थान मंदिर में स्वर्ण गुंबद, सोने की पालकी और स्वर्ण जड़ित प्रवेश द्वार ने काशी में बिना भेदभाव वाला बेगमपुरा बसा दिया। पूरे साल देश-दुनिया के लाख-लाख अनुयायियों की यात्रा से यह काशी के एक नए तीर्थ का सूर्योदय जैसा आभास कराता है। जैसे बुद्ध, रैदास, कबीर और तुलसी की इस प्राचीनतम पुरी में वैचारिक गोष्ठियों का आकार सिकुड़ा है लेकिन एकेडमिक्स में। 

अब यहां वैसी मंडलियां नहीं दिखती हैं जहां सभी धर्मावलंबी संत महात्मा एक साथ मंच साझा करते हों। हां, अड़ियों से मनन प्रकटन की स्वतंत्रता तो काशी के देह और आत्मा में अभी बसी है। काशी में बहुजन वैचारिकी और आंबेडकरवादी आवाजों की सक्रियता इन 25 वर्षों में बहुत बढ़ी। काशी को थोड़ा और खोजने की जरूरत है। पार्श्वनाथ विद्यापीठ जो श्रमण परंपरा में जैन अध्ययन का सारवान केंद्र है, की चर्चा बहुत कम होती है। सारनाथ के अनागारिक धम्मपाल की ओर से 1891 में स्थापित महाबोधि सोसायटी ऑफ इंडिया भी आज कहां गुम है कोई नहीं जानता। 

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