ज्ञानवापी: सात साल बाद अयोध्या की तरह काशी में भी फेल हुई मध्यस्थता की कोशिश, 42 मामलों की सुनवाई चल रही
Varanasi News: काशी विश्वनाथ मंदिर के बाहर बीते मंगलवार को पुलिसकर्मी सुबह 11 बजे ही मनोरंजन कक्ष के गेट पर डट गए थे। 20 से ज्यादा पुलिसकर्मी मुख्य गेट पर रहे। कक्ष के अंदर अधिवक्ताओं और दोनों पक्षों को छोड़कर किसी को जाने नहीं दिया गया। कचहरी के बाहर भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
Gyanvapi Case: सात साल पहले यानी 2019 में श्री रामजन्म भूमि अयोध्या मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता की कोशिश की थी लेकिन सफल नहीं हो सकी थी। काशी के ज्ञानवापी मामले में भी प्रारंभिक तौर पर मध्यस्थता फेल हो गई है। अब निगाह सुप्रीम कोर्ट की आगे की कार्यवाही पर टिकी है। फिलहाल, हिंदू और मुस्लिम पक्ष मामले की नियमित सुनवाई और हल अदालत के आदेश से ही चाहते हैं।
15 अक्तूबर 1991 में ज्ञानवापी का पहला वाद सिविल जज की अदालत में दाखिल हुआ था। ये जन प्रतिनिधिवाद था। वादी मुकदमा पंडित सोमनाथ व्यास, हरिहर पांडेय और प्रोफेसर रामरंग शर्मा थे। उस वक्त उनके अधिवक्ता दान बहादुर सिंह, संकठा तिवारी रहे। इसके जरिये विवादित स्थल को स्वयंभू विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग का अंग बताया गया।
2018 में सोमनाथ व्यास के निधन के बाद इस मुकदमे में वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी बन गए। यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा था। हाईकोर्ट ने छह महीने के अंदर वाराणसी की अदालत को मामले में फैसला लेने का आदेश दिया था लेकिन ज्ञानवापी से जुड़े दूसरे मामलों में सुप्रीम कोर्ट की रोक की वजह से वाराणसी की अदालत में मामले की सुनवाई नहीं पूरी कर सकी है।
सर्वेक्षण का अनुरोध किया: 2019 में अदालत में एक नई याचिका दायर कर परिसर का पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने का अनुरोध किया गया। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि वैज्ञानिक जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि मस्जिद से पहले वहां मंदिर मौजूद था या नहीं।
वीडियोग्राफी सर्वेक्षण का आदेश हुआ: शृंगार गौरी पूजा के मामले में अगस्त 2021 में पांच हिंदू महिलाओं ने वाराणसी की अदालत में याचिका दायर कर शृंगार गौरी स्थल पर प्रतिदिन पूजा करने की अनुमति मांगी। इसी याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत ने परिसर की वीडियोग्राफी और सर्वेक्षण कराने का आदेश दिया। 2022 सर्वे में शिवलिंग मिलने का दावा: मई 2022 में सर्वे के दौरान गोलाकार संरचना मिलने के बाद हिंदू पक्ष ने उसे शिवलिंग बताया, जबकि मुस्लिम पक्ष ने इसे पुराना फव्वारा बताया।
ज्ञानवापी मामले में मध्यस्थता विफल होने पर हिंदू पक्ष ने मुस्लिम पक्ष को कटघरे में खड़ा किया
ज्ञानवापी मामले में मध्यस्थता विफल होने पर हिंदू पक्ष ने मुस्लिम पक्ष को कटघरे में खड़ा किया। कहा कि मुस्लिम पक्ष के असहयोग से बातचीत आगे नहीं बढ़ सकी। वहीं मुस्लिम पक्ष ने कहा कि मस्जिद पर हमारा वैध अधिकार है।
ज्ञानवापी मामले में हिंदू पक्ष के पैरोकार डॉ. सोहन लाल आर्य ने बताया कि मंदिर पक्ष से जुड़े सभी वादी और उनके अधिवक्ता मध्यस्थता में शामिल हुए हैं। मुस्लिम पक्ष के असहयोग के कारण बातचीत आगे नहीं बढ़ सकी। ज्ञानवापी परिसर मंदिर है। मुस्लिम पक्ष को अपना दावा छोड़ देना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि अधिवक्ता आयोग और एएसआई की रिपोर्ट से स्पष्ट हो चुका है कि संबंधित संरचना मंदिर है। इस्लामिक ढांचा नहीं है।
मुगल बादशाह औरंगजेब ने 1669 में मंदिर को तुड़वा दिया था। अधिवक्ता मदन मोहन यादव ने कहा कि मुस्लिम पक्ष मन बनाकर आया था कि मध्यस्थता को सफल नहीं होने देंगे। ज्ञानवापी पर अतिक्रमण किया गया है। ज्ञानवापी हमारा है। दूसरा पक्ष अपनी शर्तों पर फैसला चाहता है जो कभी संभव नहीं होगा। अब इस मामले का हल अदालत के फैसले से ही निकलेगा।
दूसरी तरफ, अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी की ओर से अधिवक्ता रईस अहमद अंसारी ने कहा कि ज्ञानवापी संबंधित परिसर राजस्व रिकॉर्ड में मस्जिद के रूप में दर्ज है और उस पर मुस्लिम पक्ष का वैध अधिकार है। उन्होंने हिंदू पक्ष पर अनावश्यक विवाद खड़ा करने का आरोप भी लगाया।
कहा कि विवाद का अंतिम समाधान अदालत के फैसले से ही संभव होगा। अधिवक्ता एखलाक अहमद का कहना है कि ये जगह हमारी मस्जिद है। एक हजार साल से यहां नमाज हो रही है। हम कब्जा देंगे नहीं। अदालत का जो भी फैसला होगा उसे माना जाएगा।
वादिनी महिलाओं ने लगाए जयकारे : कचहरी की जिस इमारत में सुनवाई होनी थी, वहां भारी संख्या में पुलिस फोर्स मौजूद रही। इसी बीच हिंदू पक्ष की वादिनी महिलाएं अपने अधिवक्ताओं के साथ पहुंचीं। मध्यस्थता की सुनवाई से पहले हिंदू पक्ष की महिलाओं ने जयकारे भी लगाए।
ज्ञानवापी से जुड़े 42 मामलों की सुनवाई चल रही
वाराणसी। आदिविश्वेश्वर प्राचीन ज्योतिर्लिंग, शृंगार गौरी और ज्ञानवापी परिसर से जुड़े करीब 42 मामलों की सुनवाई विभिन्न अदालतों में जारी है। मामले से जुड़े अधिवक्ताओं के मुताबिक, वर्तमान में वाराणसी की अलग-अलग अदालतों में ज्ञानवापी संबंधित 36 मुकदमे लंबित हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट में छह मामलों पर सुनवाई चल रही है। इन्हीं में कुछ मामले सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। ज्यादातर मामले जिला एवं सत्र न्यायालय में विचाराधीन हैं।
सिविल जज (सीनियर डिवीजन), फास्ट ट्रैक कोर्ट और एडीजे की अदालतों में भी मूल वादों के साथ विभिन्न प्रार्थना पत्र लंबित हैं। इनमें जिला जज की अदालत में लंबित शृंगार गौरी वाद सबसे महत्वपूर्ण है। इसके अलावा पूजा-अर्चना के अधिकार, आदिविशेश्वर प्राचीन ज्योतिर्लिंग और परिसर से जुड़े अन्य विवादों पर भी अलग-अलग अदालतों में सुनवाई जारी है। सबसे पुराना मामला 1991 का मूलवाद है। इसके वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी है।
13वें ज्योतिर्लिंग को दिला रहे मान्यता... मुस्लिम पक्ष का तर्क खारिज
‘हिंदू पक्ष इस अर्जी के जरिये 13वें ज्योतिर्लिंग को मान्यता दिलाने का प्रयास कर रहा है जो कि हिंदू सनातन धर्म की भावना और स्थापित मान्यताओं के साफ तौर पर खिलाफ है क्योंकि हिंदू धर्म में पहले से ही 12 ज्योतिर्लिंगों की पवित्र सूची को मान्यता दी गई है।
वाराणसी में सिर्फ श्री काशी विश्वनाथ ही ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हैं’। मुस्लिम पक्ष की इस आपत्ति को फास्ट ट्रैक कोर्ट ने अस्वीकार कर 8 अप्रैल 2021 को साइंटिफिक सर्वे का आदेश दिया था। रडार तकनीक और हल्की-फुल्की खोदाई के जरिये सर्वेक्षण की बात हुई थी। हिंदू पक्ष की ओर से एएसआई के विशेषज्ञों से विवादित स्थल का सर्वे कराने की मांग की गई। प्राचीन स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर एवं अन्य बनाम अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद एवं अन्य में सुनवाई हुई थी।
अदालत में वादियों का कहना था कि भगवान विश्वेश्वर के मूल मंदिर के ध्वस्त होने के बाद हिंदू लोगों ने वैकल्पिक व्यवस्था के तहत नजदीक ही श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर की स्थापना कराई। आशुतोष तिवारी की अदालत ने कहा कि किसी स्थान को ज्योतिर्लिंग के रूप में मान्यता देना या न देना हिंदू धर्म के विद्वानों का विषय है, न कि इस मुकदमे का। इसलिए अदालत ने प्रतिवादियों की इस आपत्ति को स्वीकार नहीं किया।