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102वीं जयंती पर जननायक कर्पूरी ठाकुर की जीवनी: झोपड़ी से सत्ता तक, गुदड़ी के लाल की प्रेरक कहानी

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, समस्तीपुर Published by: दरभंगा ब्यूरो Updated Sat, 24 Jan 2026 03:49 PM IST
Jananayak Karpoori Thakur Biography 102nd birth anniversary From hut to power inspiring story of Gudri ke Lal
भारत रत्न जननायक कर्पूरी ठाकुर की 102वीं जयंती आज राजकीय समारोह के साथ मनाई गई। समस्तीपुर के कर्पूरीग्राम में भव्य आयोजन हुआ, जहां बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की। 24 जनवरी को मनाई जाने वाली इस जयंती के अवसर पर कर्पूरी ठाकुर के योगदान और विरासत को याद किया गया।
 
राजनीति में बने गरीबों और वंचितों की आवाज
कर्पूरी ठाकुर बिहार की राजनीति में गरीबों, पिछड़ों और दबे-कुचले वर्ग की मजबूत आवाज बनकर उभरे। वे दो बार बिहार के मुख्यमंत्री, एक बार उपमुख्यमंत्री और दशकों तक विधायक व विपक्ष के नेता रहे। 1952 में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव जीतकर राजनीति में कदम रखा। वे बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने, जिसने राज्य की राजनीति को नई दिशा दी।
 
नीतिगत फैसले और सामाजिक बदलाव
1967 में उपमुख्यमंत्री बनने के बाद कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कर दी, जिस पर उन्हें आलोचना का भी सामना करना पड़ा। 1971 में मुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने किसानों को राहत देते हुए गैर-लाभकारी जमीन पर मालगुजारी टैक्स खत्म किया। 1977 में मुख्यमंत्री रहते हुए मुंगेरीलाल कमीशन लागू कर नौकरियों में पिछड़ों और गरीबों को आरक्षण दिया, जिससे वे सवर्ण वर्ग के विरोध का भी सामना करते रहे।
 
पितौझिया से कर्पूरीग्राम तक की यात्रा
जननायक कर्पूरी ठाकुर का जन्म समस्तीपुर जिले के पितौझिया गांव में हुआ था, जिसे आज कर्पूरीग्राम के नाम से जाना जाता है। उनके पिता गोकुल ठाकुर सीमांत किसान थे और पारंपरिक नाई का काम करते थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कर्पूरी ठाकुर ने करीब ढाई साल जेल में बिताए, जिसने उनके राजनीतिक जीवन को और मजबूती दी।
 
समाजवादी विचारधारा और नेतृत्व
कर्पूरी ठाकुर अखिल भारतीय छात्र संघ से जुड़े रहे। लोकनायक जयप्रकाश नारायण और समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया उनके राजनीतिक गुरु थे। वे 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 और 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने पिछड़ा वर्ग को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिलाने की दिशा में अहम पहल की।

पढ़ें- Bihar News: कर्पूरी ठाकुर जयंती पर कर्पूरीग्राम में भव्य आयोजन, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दी श्रद्धांजलि
 
सादगी और निष्कलंक जीवन
राजनीति में लंबा सफर तय करने के बावजूद कर्पूरी ठाकुर के पास निधन के समय कोई निजी संपत्ति या पक्का मकान तक नहीं था। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज और वंचित वर्गों के हित में समर्पित कर दिया। सादगी, ईमानदारी और जनसेवा उनकी पहचान बनी रही।
 
क्यों कहलाए ‘जननायक’?
राजनीति के जानकारों के अनुसार उनकी अपार लोकप्रियता और जनता से गहरे जुड़ाव के कारण उन्हें ‘जननायक’ कहा गया। स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक और राजनेता के रूप में उन्होंने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया। उनकी इसी जनसेवा भावना के कारण वर्ष 2025 में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया।
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