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दिव्यांगता नहीं बनी दीवार, जज्बे ने दिलाई नई पहचान, ग्रेनो में लगा रहे चौके-छक्के
नोएडा ब्यूरो
Updated Mon, 02 Feb 2026 01:20 PM IST
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ग्रेनो के शहीद विजय सिंह पथिक स्पोर्ट्स स्टेडियम में इंग्लैंड के खिलाफ खेली जा रही पांच दिवसीय मिक्स्ड डिसेबिलिटी टी-20 श्रृंखला सिर्फ क्रिकेट मुकाबला नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है, जो किसी न किसी संघर्ष से जूझ रहे हैं। ये खिलाड़ी साबित कर रहे हैं कि मजबूत इरादों के आगे कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। दिव्यांग भारतीय टीम में कुछ क्रिकेटर ऐसे हैं जो न केवल दिव्यांगता से लड़े हैं, बल्कि उन्होंने अपनी कमजोर को मात देकर अंतरराष्ट्रीय फलक तक छाने का जज्बा दिखाया है। ऐसे ही तीन क्रिकेटरों ने अमर उजाला से अपने संघर्ष की कहानी साझा की।
अभ्यास के लिए रोजाना 130 किमी का किया सफर तक
मिश्रित दिव्यांग भारतीय टीम की कमान संभाल रहे मुंबई के कोली गांव (कोलीवाड़ा) निवासी रविंद्र गोपीनाथ संते लिफ्टी स्पिनर और लिफ्टी बल्लेबाज हैं। टीम में शामिल होने तक का सफर काफी संघर्ष भरा रहा। उन्होंने बताया कि जन्म से उनका सीधा हाथ पैरालिसिस हैं। लेकिन कभी भी इसको अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। क्रिकेट खेलना उन्हें अच्छा लगता हैं। पहले गांव में गांव के साथियों के साथ टेनिस बॉल से क्रिकेट खेला करते थे। लेकिन डीसीसीआई की इंडिया में टीम में शामिल होने के लिए गांव से 65 किमी दूर तैयारियों के लिए जाना होता था। आने जाने में कुल करीब 130 किमी की दूरी तय करनी होती थी और इससे समय की बर्बादी होती थी। क्योंकि गांव के आसपास अंतरराष्ट्रीय मानकों के आधार पर स्टेडियम नहीं था। एक क्रिकेटर बनने में गांव से सभी लोगों से काफी सहयोग मिला। खासकर गांव के सरपंच ने काफी स्पोर्ट किया हैं।
दुर्घटना से बचपन में कट गया था हाथ
भारतीय टीम के बल्लेबाज कर्नाटक के बेंगलुरु निवासी शिव शंकरा की कहानी भी किसी प्रेरणा से कम नहीं है। महज छह साल की उम्र में एक सड़क दुर्घटना में वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। डॉक्टरों को उनका दायां हाथ काटना पड़ा, जिससे वे दिव्यांग हो गए। लेकिन शिव शंकरा का सपना कुछ और ही था। एक हाथ से क्रिकेट खेलने की शुरुआत करते समय उन्हें ताने भी सुनने पड़े, लेकिन उन्होंने इन बातों को नजरअंदाज किया। कड़ी मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर उन्होंने टॉप ऑर्डर में बल्लेबाजी शुरू की और आज वे भारतीय मिश्रित दिव्यांग टीम का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
सपने को किया साकार
मुंबई निवासी आकाश पाटिल बचपन में पोलियो की चपेट में आ गए थे, जिससे उनका बायां पैर प्रभावित हुआ। हालांकि माता-पिता ने कभी उन्हें अपनी कमजोरी का एहसास नहीं होने दिया। पिता स्वयं क्रिकेट खेला करते थे और बेटे को भी क्रिकेट के गुर सिखाते थे। आकाश बताते हैं कि एक समय उन्हें लगा था कि भारतीय टीम में खेलने का सपना अधूरा रह जाएगा। लेकिन डीसीसीआई ने उन्हें वह मंच दिया, जहां वे अपने सपनों को साकार कर सके। आज वे लिफ्टी स्पिनर और लिफ्टी बल्लेबाज के रूप में टीम के लिए अहम भूमिका निभा रहे हैं।
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