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हिसार में बायोसेंसर व एआई का प्रयोग कर ब्रुसेलोसिस का पता लगाएंगे पशु वैज्ञानिक
पशुओं में ब्रुसेलोसिस की पहचान के लिए अब बायोसेंसर तथा आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का प्रयोग किया जाएगा। बायोसेंसर तथा एआई के प्रयोग से पशु में बीमारी से पहले ही लक्षणों व उसके डीएनए के आधार पर पता किया जा सकेगा कि पशु में ब्रुसेलोसिस का खतरा कितना है। देश में 25 से 45 साल की आयु के लोग ब्रुसेलोसिस की चपेट में आ रहे हैं। कच्चा दूध पीने तथा मांस खाने से भी भी ब्रुसेलोसिस की बीमारी आप तक पहुंच सकती है। देश भर के कुल पशुओं में 8 प्रतिशत गाय, 4 प्रतिशत भैंस, 12 प्रतिशत भेड़, में ब्रुसोलिसिस मिल रही है।
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डाॅ. एम नालिंगम ने अमर उजाला से बातचीत में बताया कि कंट्रोल प्रोग्राम के तहत देश भर में इसका पांचवा चरण शुरु किया गया है। उन्होंने बताया कि देश को ब्रुसेलोसिस मुक्त करने के लिए बायोसेंसर व एआई का प्रयोग शुरु किया गया है। देश भर में चलाए जा रहे अभियान के पांचवे चरण में एस 19 वैक्सीन का उपयोग बढ़ाया गया है। केंद्र सरकार के इस अभियान में 4–8 महीने के बछड़ों, कटड़ों, कटड़ी, बछड़ी को यह वैक्सीन दी जाती है। इसके बाद उस पशु में कभी ब्रुसेलोसिस नहीं आता। गर्भवती पशुओं में टीकाकरण से गर्भपात का खतरा रहता है। ऐसे पशुओं को यह वैक्सीन नहीं दी जाती। यदि वैक्सीनेशन और निगरानी (सर्विलांस) में लापरवाही बरती गई, तो यह बीमारी न केवल पशुओं बल्कि इंसानों के लिए भी खतरनाक साबित हो सकती है। ब्रुसेलोसिस के नियंत्रण के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपाय सही समय पर वैक्सीनेशन है। कुछ मामलों में यह भी सामने आया कि वैक्सीनेशन के बाद पॉजिटिव संकेत लंबे समय तक बने रह सकते हैं। इस बीमारी की रोकथाम के लिए सर्विलांस यानी लगातार निगरानी को बेहद जरूरी है। इसमें पशुओं की नियमित जांच, दूध के नमूनों की टेस्टिंग और संक्रमित मामलों की ट्रेसिंग शामिल है। बूचड़खानों और बाजारों में पशुओं की जांच को भी अनिवार्य किया गया है। अगर ब्रुसेलोसिस ग्रस्त पशु का कच्चा दूध आप सेवन करेंगे या ऐसे पशु का मीट आप खाएंगे तो यह बीमारी आप तक पहुंच सकती है।
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