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My Village, My Pride: In the village of Pali, the fifth—and in some cases, the sixth—generation of families is serving in the Army to defend the nation.
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मेरा गांव मेरी शान: गांव पाली में किसी की छठी तो किसी की पांचवीं पीढ़ी कर रही सेना में देश की रक्षा
सैनिकों की खान कहे जाने वाले गांव पाली में हर परिवार में दो से तीन पीढ़ी में सैनिक रहे हैं, लेकिन कुछ परिवारों में फिलहाल पांचवीं और छठी पीढ़ी में भी सैनिक हैं। परिवारों की सैनिक पृष्ठभूमि ही ग्रामीण युवाओं का मनोबल बढ़ा रही हैं। पीढ़ी-दर- पीढ़ी चली आ रही भारतीय सैना की इस परंपरा के निभाने के लिए युवा भी आगे आ रहे हैं। यही कारण है कि पिछले एक सप्ताह के दौरान घोषिए हुए भारतीय सेना के विभिन्न भर्ती परिणामों में गांव के 14 युवाओं का चयन भारतीय सेना में हुआ है।
भारतीय सेना के प्रति इस दिवानगी ने ही एक पूर्व सैनिक देशराज फौजी के हाथों में सरपंची की चौधर सौंपी है। ग्रामीणों ने बताया कि गांव में शुरु से ही देशभक्ति का जज्बा रहा है और हर पीढ़ी इसको निभा रही है। सैनिकों के कारण ही परिवार में अनुशासन और सेना में जाने की लय बनी हुई है। गांव के वीरों ने द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर ऑपरेशन सिंदूर, सर्जिकल स्ट्राइक, पाकिस्तान, चीन, यहूदी, कारगिल जैसे युद्ध लड़ें हैं और किसी ने युद्ध में हथियार आपूर्ति से भी अपना योगदान दिया है। पीढ़ी दर पीढ़ी सैनिक बनने की परंपरा को सैनिकों ने गौरवशाली बताया और युवाओं को भी सेना में जाने के लिए प्रेरित किया है। उनका कहना है कि देशरक्षा व भक्ति सर्वप्रथम होनी चाहिए। अगर सीमाओं की रक्षा होगी तो देश को बाहरी आतंक से मुक्ति मिलेगी ।
सैनिकों के विचार और परिवार की कहानी:
मेरे परिवार में तीन पीढ़ी फौज में रही हैं और मैं तीसरी पीढ़ी में हूं। सन 1984 में भर्ती हुआ और 24 साल सेवा देने के बाद सिगनल कौर में हवलदार पद से रिटायर हुआ। मैंने सन 2007 तक मिल्टन और कारगिल युद्ध में लड़ाई लड़ी। मेरे पिता बनवारी सिंह 19 राजपूत रेजिमेंट जबकि ताऊ हुकम सिंह अशोक चक्र सम्मानित 20 राजपूत रेजिमेंट में रहे। इनके अलावा चाचा जंगबीर सिंह सूबेदार और महाबीर सिंह नायक के पद से रिटायर हुए हैं। अब परिवार के 15 से अधिक छोटे बच्चे भी सेना की तैयारी कर रहे हैं। - मदन सिंह, हवलदार
मैंने सन 1984 से 2007 तक 6 राजपूत बटालियन में अपनी सेवाएं दी और कश्मीर की हर घाटी व रास्तों पर गश्त की। इनके अलावा कारगिल युद्ध में भी मैंने लड़ाई लड़ी। मैं परिवार की पांचवीं पीढ़ी रहा और बेटा धीरज यानी छठी पीढ़ी भी सेनामें सेवा दे रहे हैं। इनके साथ ही पिता जसवंत सिंह राजपूतान राज राइफल में रहे और द्वितीय विश्वयुद्ध में अपनी भागीदारी निभाई। वहीं बेटे धीरज ने अब ऑपरेशन सिंदूर में अपनी भागीदारी निभाई है। दादा चंद्रसिंह और परदादा श्याम सिंह और मेरे तीन भाइयों ने भी सेना में रहकर देशसेवा की है।
-- सत्यपाल सैनी, पूर्व सैनिक
हमारी तीसरी पीढ़ी ने भी सेना में सेवा दी हैं और अब मेरे एक बेटा और बेटी दोनों सेना में हैं और मेरे दो भाई भी सेना में फिलहाल सेवा दे रहे हैं। दोनों ने ही प्रतिदिन दौड़ व अन्य गतिविधियां कर रहे हैं। मैंने भी कारगिल में युद्ध सेना को सामान पहुंचाने में मदद की। चाइना व बांग्लादेश की लड़ाई में मेरे पिता ने भी अपनी भूमिका निभाई थी।
--- महेंद्र सिंह, सूबेदार ऑर्नरी लेफ्टिनेंट
मुझे आर्मी से रिटायर हुए 14 साल हो गए हैं। साढ़े 4 साल पहले हमने एक्स-सर्विसमेन लीग की स्थापना की थी। सैनिकों की संख्या काफी अधिक है। हमारी भी पांचवीं पीढ़ी तक सेना में सेवा कर चुकी हैं। अब युवाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। बच्चों को बाल्यकाल में ही फौज में भर्ती कराने की ठान लेते हैं और बच्चों का रुझान भी उसी ओर रहता है। इससे बच्चे एक-दूसरे और बुजुर्गों को देखकर प्रेरित होते हैं।
--- किशनसिंह तंवर, सूबेदार मेजर
मैं राजपूताना राज राइफल से रिटायर हूं और मेरा बेटा भी सेना में सेवा दे रहा है। अब मैं अपने पोतों को सेना में जाने की तैयारी करवा रहा हूं और हमारी तीन पीढ़ी सेना में पहुंची, इसके लिए गर्व महसूस कर रहे हैं। हमने भी युद्ध में बटालियन के साथ ही कार्य किया और आज अपने परिवार के बच्चों के लिए रोल मॉडल बने हुए हैं। अब गांव के युवाओं को भी सेना में जाने के लिए प्रेरित कर रहा हूं।
--- प्रेम फौजी, पूर्व सैनिक
मैं अपने परिवार का पहला फौजी हूं और अब अपने बच्चों को भी सेना में जाने के लिए तैयार कर रहा हूं। पाली के राजकीय स्कूल में आजादी उत्सव पर बच्चों को फौज की जानकारी देते हैं और साथ ही स्कूलों की विजिट करके भी सेना के कार्यों से अवगत कराया जाता है। इनके अलावा सामाजिक व धार्मिक कार्यों में भी अपना योगदान दे रहे हैं।
--- अवधेश कुमार, सूबेदार
गांव में युवाओं का प्रेरणा स्रोत स्वयं युवा ही हैं। गांव में अच्छा खेल स्टेडियम है और दो एनआईएस कोच भी नियुक्त हैं। प्रतिदिन बाबा जयरामदास के मंदिर में मत्था टेकने के बाद युवा तैयारी करते हैं। एक-दूसरे को देखकर ही प्रेरित होते हैं। सेना में चयन होने पर युवाओं का सम्मान किया जाता है।
--- देशराज फौजी, सरपंच
मेरा भी फौज में जाने का सपना था और मैं भी गांव के फौजियों को देखकर प्रेरित होता रहा है। उनके कारण ही मेरा मनोबल कभी नहीं टूटा और आज मैंने कठिन परिश्रम और कोच के मार्गदर्शन में सफलता हासिल की है। मेरा चयन सेना में बतौर क्लर्क हुआ है।
--- अरुण, सेना क्लर्क
गांव में देशभक्ति का ऐसा माहौल बना हुआ है कि हर युवा केवल फौज में जाने की बात करता है। खेल स्टेडियम में ट्रेनिंग और अकादमी में ट्रेनिंग लेकर आज यह मुकाम पाया है। जिस तरह फौजियों को सम्मान मिलता है उसी तरह मैं भी सम्मान पाना चाहता हूं और देशसेवा करना चाहता हूं।
---- पंकज, क्लर्क
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