दमोह जिले में फर्जी एमबीबीएस डिग्री के जरिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में नौकरी पाने का बड़ा मामला सामने आया है। शासकीय आरोग्य केंद्र और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के अंतर्गत संचालित संजीवनी क्लीनिक में पदस्थ दो डॉक्टरों के पास बीएचएमएस और बीडीएस की वास्तविक डिग्री मिली, लेकिन एमबीबीएस की डिग्री फर्जी पाई गई। मामले का खुलासा होने के बाद पुलिस अब इस पूरे रैकेट के मुख्य सरगनाओं तक पहुंचने में जुट गई है।
पुलिस पूछताछ में आरोपियों ने एक ऐसे गिरोह का खुलासा किया है, जो कथित रूप से लाखों रुपए लेकर फर्जी एमबीबीएस डिग्री तैयार कराता था। सूत्रों के अनुसार गिरोह के तार भोपाल और ग्वालियर से जुड़े बताए जा रहे हैं। पुलिस टीम संभावित आरोपियों की तलाश में रवाना हो चुकी है, हालांकि मामले की भनक लगते ही गिरोह से जुड़े लोग फरार बताए जा रहे हैं।
रिमांड में पूछताछ के बाद खुलासा
दो दिन पहले ही सीएमएचओ डॉ राजेश आठिया की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने दमोह से दो और जबलपुर से एक आरोपी डॉक्टर को गिरफ्तार किया था। रविवार शाम पुलिस अधीक्षक आनंद कलादगी ने कोतवाली थाना में पूरे मामले का खुलासा किया था। न्यायालय में पेशी के बाद आरोपियों को रिमांड पर लिया गया, जहां पूछताछ में कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आईं। एसपी आनंद कलादगी ने बताया कि आरोपियों से मिले इनपुट के आधार पर पुलिस टीम गिरोह के अन्य सदस्यों तक पहुंचने का प्रयास कर रही है। जल्द ही फर्जी डिग्री बनाने वाले मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार किया जाएगा।
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ये हैं गिरफ्तार आरोपी
पकड़े गए आरोपियों में डॉ. कुमार सचिन यादव निवासी शंकुतलापुरी, ग्वालियर और डॉ. राजपाल गौर निवासी मगरधा, सीहोर शामिल हैं। दोनों की नियुक्ति राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत संचालित संजीवनी क्लिनिक में भोपाल स्तर से की गई थी। पूछताछ में सामने आया कि डॉ. सचिन यादव के पास बीडीएस की डिग्री थी और वह करीब पांच महीने पहले संजीवनी क्लिनिक में पदस्थ हुआ था। वहीं डॉ. राजपाल गौर के पास बीएचएमएस की डिग्री मिली, जो लगभग एक वर्ष से सेवाएं दे रहा था। दोनों के पास मेडिकल काउंसिल में मान्य एमबीबीएस पंजीयन नहीं मिला।
8 से 10 लाख में बनवाई गई फर्जी डिग्री
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक आरोपियों ने पूछताछ में बताया कि उन्होंने 8 से 10 लाख रुपए देकर फर्जी एमबीबीएस डिग्री बनवाई थी। जांच में जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर और रीवा मेडिकल कॉलेज के नाम भी सामने आए हैं। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि फर्जी दस्तावेज कहां और किस नेटवर्क के जरिए तैयार किए गए।
जबलपुर से भी एक डॉक्टर हिरासत में
डॉ. सचिन यादव की निशानदेही पर पुलिस ने डॉ. अजय मोर्य को भी अभिरक्षा में लिया है। वह मूल रूप से मुरैना का निवासी है और वर्तमान में जबलपुर के संजीवनी अस्पताल में करीब ढाई साल से कार्यरत था। पुलिस के अनुसार उसके पास भी फर्जी एमबीबीएस डिग्री मिली है।
रोज 30 से 40 मरीज देख रहे थे डॉक्टर
सीएमएचओ डॉ. राजेश अठ्या ने बताया कि दोनों डॉक्टर प्रतिदिन 30 से 40 मरीजों का इलाज कर रहे थे। हालांकि संजीवनी क्लिनिक में केवल ओपीडी सेवाएं संचालित होती हैं और गंभीर मरीजों का इलाज नहीं किया जाता। उन्होंने कहा कि अब तक किसी मरीज को गंभीर नुकसान पहुंचने की जानकारी सामने नहीं आई है। सीएमएचओ ने बताया कि दोनों डॉक्टरों को हर महीने लगभग 70 से 80 हजार रुपए वेतन मिलता था। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की वेबसाइट पर जब उनके रजिस्ट्रेशन नंबर का मिलान किया गया तो वह किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर दर्ज पाए गए। इसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।
जिलेभर में डॉक्टरों की डिग्री जांच शुरू
मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग अलर्ट हो गया है। सीएमएचओ डॉ. राजेश अठ्या ने निर्देश दिए हैं कि जिले में कार्यरत सभी नियमित डॉक्टरों, एनएचएम डॉक्टरों और बॉन्ड पर नियुक्त चिकित्सकों की डिग्रियों की जांच की जाए। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार जिला अस्पताल में करीब 38 डॉक्टर, एनएचएम के 15 डॉक्टर और विभिन्न ब्लॉकों में लगभग 28 डॉक्टर पदस्थ हैं। सभी के दस्तावेजों का सत्यापन कराया जा रहा है।
एनएचएम से निरस्तीकरण की तैयारी
सीएमएचओ ने बताया कि दोनों आरोपियों की नियुक्ति राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन भोपाल द्वारा की गई थी। जांच में एमबीबीएस डिग्री फर्जी पाए जाने के बाद नियुक्ति निरस्त करने के लिए भोपाल को पत्र भेजा गया है। अब नियुक्तिकर्ता संस्था ही इनकी सेवाएं समाप्त करेगी। मामले ने स्वास्थ्य विभाग की भर्ती प्रक्रिया और दस्तावेज सत्यापन प्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग दोनों स्तर पर जांच जारी है।