जयपुर से लगभग 50 किलोमीटर दूर जोबनेर कस्बे की पहाड़ी पर स्थित प्राचीन ज्वाला माता मंदिर में शारदीय नवरात्रि की शुरुआत पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। देशभर से लाखों भक्तों के आने का सिलसिला शुरू हो चुका है, माता के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त कर, नवरात्रि में मंदिर परिसर भक्ति, पूजा-अर्चना और उत्साह से सराबोर रहेंगे।
भव्य आयोजन और पूजा-अर्चना
नवरात्रि के पहले दिन मंदिर में अखंड दीप प्रज्वलित किया गया और विशेष आरती का आयोजन हुआ। भक्त उपवास रखकर माता से मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना कर रहे हैं। मंदिर परिसर में विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, वहीं रातभर माता की स्तुति में भजन-कीर्तन और जागरण चला।
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श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया है। सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद की गई है ताकि दर्शन के दौरान किसी भी प्रकार की अव्यवस्था न हो और श्रद्धालु सुरक्षित वातावरण में पूजा कर सकें।
मंदिर का पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व
करीब 700 मीटर ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर में माता के ब्रह्म और रुद्र दोनों स्वरूप की पूजा की जाती है। सात्विक पूजा में खीर, पूड़ी, चावल और नारियल का भोग लगाया जाता है, जबकि रुद्र पूजा में मांस-मदिरा का भोग भी चढ़ता है। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि ऐतिहासिक महत्व के लिए भी जाना जाता है।
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किंवदंती के अनुसार राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान होने पर सती ने आत्मदाह किया था। भगवान शिव के तांडव को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के अंगों के 51 टुकड़े किए। माना जाता है कि जोबनेर की पहाड़ी पर सती का घुटना गिरा, जिसकी पूजा आज भी की जाती है। यही कारण है कि इस मंदिर को हिमाचल के ज्वाला माता शक्तिपीठ की उपपीठ माना जाता है।
लगभग 1300 वर्ष पुराने इस मंदिर में हर नवरात्रि देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्त माता के दर्शन कर सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना करते हैं। मंदिर परिसर में निरंतर भजन, जागरण और भंडारे का आयोजन हो रहा है, जिससे वातावरण पूर्णतः भक्तिमय बना हुआ है।