जालोर के गौरवशाली इतिहास और शौर्य परंपरा के प्रतीक वीर वीरमदेव की विशाल प्रतिमा स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हो गया है। टुंकाली पहाड़ी क्षेत्र में तीन दिनों से चल रहे वैदिक हवन कार्यक्रम की विधिवत पूर्णाहुति शनिवार को संपन्न हुई। इस अवसर पर भामाशाह परिवार की ओर से पहाड़ी के नीचे 18 इंच ऊंची प्रतीकात्मक प्रतिमा की स्थापना कर प्राण-प्रतिष्ठा की गई, जिसे मुख्य प्रतिमा स्थापना की औपचारिक शुरुआत माना जा रहा है।
मुगल शासक अलाउद्दीन खिलजी की सेना को पराजित करने वाले वीर शासक वीरमदेव की मुख्य प्रतिमा 18 फीट ऊंची और लगभग 3 टन वजनी है। टुंकाली पहाड़ी की चोटी पर स्थान सीमित होने और प्रतिमा के अत्यधिक वजन को देखते हुए इसे सामान्य साधनों से ऊपर ले जाना संभव नहीं है। ऐसे में भारतीय सेना के हेलिकॉप्टर की सहायता से प्रतिमा को एयरलिफ्ट कर पहाड़ी की चोटी तक पहुंचाया जाएगा। फिलहाल सेना की ओर से एयरलिफ्ट की तिथि तय नहीं हुई है।
वीरमदेव फाउंडेशन के अध्यक्ष देवेंद्र सिंह मोछाल ने बताया कि प्रतिमा स्थापना से जुड़ी सभी तकनीकी और प्रशासनिक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। जैसे ही सेना की ओर से तारीख निर्धारित की जाएगी, प्रतिमा को टुंकाली पहाड़ी पर स्थापित कर दिया जाएगा। उद्घाटन समारोह को भव्य स्वरूप देने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री एवं राजस्थान के मुख्यमंत्री को आमंत्रण भेजा गया है।
प्रतिमा स्थापना के दिन वीर वीरमदेव के शौर्य, पराक्रम और जालोर के ऐतिहासिक संघर्षों पर आधारित पैनोरमा और विशेष बुकलेट का विमोचन भी किया जाएगा, जिसे आमजन को निशुल्क वितरित किया जाएगा। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को जालोर के गौरवशाली इतिहास से जोड़ना है।
वीर वीरमदेव का शौर्यपूर्ण इतिहास
वीर वीरमदेव, जालोर के प्रतापी शासक कान्हड़देव के पुत्र थे। इतिहास में वर्णित है कि उन्होंने अलाउद्दीन खिलजी की सेना को पराजित कर जालोर की रक्षा की थी। यह युद्ध जालोर के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार खिलजी की पुत्री फरोजा वीरमदेव की वीरता से प्रभावित थी और उसने विवाह प्रस्ताव भिजवाया था, जिसे वीरमदेव ने अस्वीकार कर स्वाभिमान और मातृभूमि को सर्वोपरि रखा।
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10 किलोमीटर दूर से दिखाई देगी प्रतिमा
करीब दो वर्षों में तैयार की गई यह प्रतिमा टुंकाली पहाड़ी पर स्थापित होने के बाद लगभग 10 किलोमीटर दूर से भी दिखाई देगी। प्रतिमा अष्टधातु से निर्मित है और इसे तीन हिस्सों में तैयार किया गया है। सबसे भारी हिस्सा अश्व है, जिसका वजन करीब 2 टन है। तीनों हिस्सों को ब्रास पेस्ट के माध्यम से जोड़ा गया है। वर्तमान में प्रतिमा जालोर के ग्रेनाइट क्षेत्र स्थित एक फैक्ट्री में सुरक्षित रखी गई है।
प्रतिमा की कुल ऊंचाई 18 फीट है, जबकि फाउंडेशन की ऊंचाई 10 फीट और चौड़ाई 6 फीट रखी गई है। इस भव्य प्रतिमा का निर्माण हरिद्वार के प्रसिद्ध मूर्तिकार फकीर चरण परिड़ा ने किया है, जिन्होंने इससे पहले भी पुराने संसद भवन सहित देश की कई प्रतिष्ठित प्रतिमाओं का निर्माण किया है। वीर वीरमदेव की यह प्रतिमा न केवल जालोर के इतिहास को जीवंत करेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए शौर्य, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का प्रेरणास्रोत बनेगी।