सलूंबर जिले के नठारा में प्रधानमंत्री वन धन योजना के तहत धराल माता वन धन विकास केंद्र की महिलाओं ने आत्मनिर्भर बनने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किए जा रहे हैं। इसी क्रम में सराडा ब्लॉक के नठारा की धराल माता वन धन विकास केंद्र की आठ महिलाएं हर्बल गुलाल का निर्माण कर अपनी अलग पहचान बना रही हैं। इन्होंने लगभग अब तक तीन सौ पच्चीस किलो से अधिक हर्बल गुलाल तैयार किया है।
अतिरिक्त जिला कलेक्टर राजलक्ष्मी गहलोत ने अवलोकन कर महिलाओं से संवाद भी किया और गुलाल तैयार करने की प्रक्रिया को बारीकी से देखा। कहा कि इनका यह प्रयास न केवल आर्थिक स्वावलंबन की दिशा में एक बड़ा कदम है। बल्कि लोगों को रासायनिक मुक्त और प्राकृतिक रंगों से सुरक्षित होली मनाने का भी अवसर दे रहा है। अतिरिक्त जिला कलेक्टर राजलक्ष्मी गहलोत नागरिकों से अपील की कि वे स्वयं हर्बल गुलाल का उपयोग करें और रासायनिक रंगों से बचकर प्राकृतिक और सुरक्षित होली का त्योहार मनाएं।
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समूह की महिला वन धन मैनेजर चम्पा मीणा ने बताया कि वे हर्बल गुलाल बनाने के लिए रजगे और पलाश के फूलों एवं पालक का उपयोग करती हैं, जिससे यह गुलाल पूरी तरह प्राकृतिक और त्वचा के लिए सुरक्षित होता है। यह पहल न केवल एक स्वस्थ विकल्प प्रदान कर रही है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक है। महिलाएं अब स्वरोजगार से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रही हैं। निरीक्षण के दौरान टीएडी विभाग वेद प्रकाश, पवन मेहता, सहित वन सखी मंजू मीणा, पार्वती देवी, लक्ष्मी सहित अन्य उपस्थित रहे।
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इस गांव में जलाई जाती है नारियलों की होली
पूरे भारत में रंगों के त्योहार होली को बड़े धूमधाम से मनाने की तैयारियां जोरों से चल रही हैं। होली के इस पारंपरिक त्योहार का खुमार बाजारों से लोगों पर अभी से सिर चढ़कर बोलने लगा है। बरसाने की लठमार होली से लेकर जयपुर की फूलों की होली तक देश के अलग-अलग हिस्सों में कई तरीकों से होली मनाई जाती है। ऐसा ही एक अलग अंदाज राजस्थान के सलूंबर जिले में भी दिखाई पड़ता है। सलूंबर जिले के सेमारी में करकेला धाम की नारियल वाली होली लोगों को लंबे समय से आकर्षित करती रही है। करकेला धाम में नारियल से होली खेलने की परंपरा है। यहां बरसाने की लठमार होली की तरह नारियल को एक-दूसरे पर मारकर होली नहीं खेली जाती है। करकेला धाम में लोग होलिका को नारियल भेंट कर होली मनाते हैं।

आदिवासियों का धार्मिक स्थान है करकेला धाम
सलूंबर के सेमारी कस्बे की धनकावाड़ा ग्राम पंचायत से करीब डेढ़ किमी की दूरी पर स्थित करकेला धाम को आदिवासियों का पवित्र धार्मिक स्थान माना जाता है। स्थानीय आदिवासियों की मान्यताओं के अनुसार, होलिका को अपनी बेटी के तौर पर देखा जाता है। आदिवासी मानते हैं कि होलिका उनकी बेटी थी, करकेला धाम एक पहाड़ी पर स्थित है।
करकेला धाम में जलती है सबसे पहले होली
आदिवासियों के धार्मिक स्थान करकेला धाम में सबसे पहले होली जलाई जाती है। धाम के पहाड़ी पर होने की वजह से दूर से ही होलिका दहन दिख जाता है। इसके बाद ही आसपास के इलाकों में होली जलाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि सबसे पहले करकेला धाम में ही होली जलनी चाहिए। यहां होली दहन के बाद उठने वाली आग की लपटें देख लोग होली जलाने की तैयारी करते हैं।
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होलिका को दी जाती है नारियल की भेंट
यहां रहने वाले लोग बताते हैं कि आदिवासी लोगों की मान्यता है कि पहाड़ पर स्थित करकेला धाम के पास ही होलिका प्रहलाद को गोदी में लेकर आग में बैठी थी। भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रहलाद को बचाने के लिए लीला रची, जिसके चलते आग में होलिका जल गई और प्रहलाद बच गए। आदिवासियों का मानना है कि होलिका इसी इलाके की रहने वाली थी। इसी वजह से आदिवासियों के बीच होलिका को विदाई देने के लिए नारियल यानी श्रीफल भेंट किए जाते हैं।करकेला धाम में होलिका के साथ ही यहां नारियलों की होली जलाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि अगर कोई व्यक्ति होलिका को नारियल भेंट कर कोई मन्नत मांगता है तो वो जरूर पूरी होती है। करकेला धाम में धूनी लगातार जलती रहती है।
संभाग भर से आते हैं हजारों की संख्या में भक्त
होली की पूर्व संध्या से ही वहां पर भक्तों का पहुंचना शुरू हो जाता है। होली के दिन डूंगरपुर, खेरवाड़ा, प्रतापगढ़, उदयपुर, बांसवाड़ा सहित अन्य जिलों के हजारों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं।शाम होते-होते करकेला धाम पर पांव रखने की जगह नहीं मिलती है। हजारों की संख्या में लोग एकत्रित होकर पारंपरिक नृत्य गैर खेलते हुए होलिका का दहन करते हैं। भक्तों द्वारा होलिका दहन के लिए नारियल और चुनरी भेंट कर अपनी मन्नतें मांगते हैं और भक्तों की मन्नतें पूरी होती हैं। इस क्षेत्र में सबसे पहले होली का दहन यहीं पर होता है और इसकी लौ देखने के बाद अन्य जगह पर होलिका का दहन होता है।