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मोबाइल के दौर में थम गया 'वो काटा' का शोर, न पहले जैसे पतंगबाज, न पतंगबाजी का शौक

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: मुकेश कुमार Updated Tue, 14 Jan 2020 02:20 PM IST
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kites fly on makar sankranti 2020
पतंग बाजार - फोटो : अमर उजाला
मैं हूं पतंग ए कागजी, डोर है उसके हाथ में

चाहा इधर घटा दिया, चाहा उधर बढ़ा दिया

नजीर अकबरबादी ने आगरा में ही यह शेर लिखा। वो खुद पतंगबाजी के शौकीन थे। वो क्या उस दौर में आगरा की पतंगबाजी कलकत्ता (कोलकाता) तक मशहूर थी। यमुना किनारे बड़े मुकाबले होते थे पतगंबाजों के बीच। वो काटा का शोर मचता था....यह शोर अब खामोश है। न पहले जैसे पतंगबाज हैं, न ही पतंगबाजी का शौक रहा। 
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पतंग खरीदते लोग - फोटो : अमर उजाला
शाहगंज के सुनील कर्मचंदानी बताते हैं कि पतंग की बात छिड़ती है तो बचपन याद आ जाता है। इस छत से उस छत पूरी दोपहरी गुजर जाती थी पतंग उड़ाने के लिए ठिकाने ढूंढते थे। छुट्टी का दिन हुआ तो पहुंच जाते थे। अब तो गिनती की पतंगें उड़ती हैं, वे भी मकर संक्रांति के दिन।
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पार्क में पतंग उड़ाते लोग - फोटो : अमर उजाला
माल का बाजार (छत्ता) के हरिचरन सिंह बताते हैं कि आगरा के पतंगबाज 1980 तक दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता, अहमदाबाद तक जाते थे पतंगबाजी के मुकाबलों में। माल का बाजार में चरखी बनाने का बड़ा कारोबार हुआ करता था। इसी बाजार के आरिफ अंसारी बताते हैं कि टीवी के आते ही पतंग के कारोबार की रौनक छिनी। अब तो न के बराबर रह गया है।
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पतंग बाजार - फोटो : अमर उजाला
इंटरनेट और मोबाइल की लत ने बच्चों में पतंगबाजी का शौक भी खत्म कर दिया। अब इक्का-दुक्का ही पतंग उड़ती नजर आती है। मकर संक्रांति पर तो लगभग हर गली और घर में पतंग उड़ाते हुए बच्चे नजर आते थे। पतंग बनाने का कार्य करने वालों का तो यही कहना था कि बच्चों को मोबाइल से फुरसत मिले तो ही पतंग उड़ाएंगे।
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पतंग बनाता युवती - फोटो : अमर उजाला
यमुनापार के पीलाखार में 25 घरों में पतंग बनाने का कार्य होता है। सुहैल ने बताया कि साल दर साल पतंग का धंधा कम होता जा रहाहै। पहले तो मकर संक्रांति से पतंग बनाने के आर्डर महीने भर पहले से ही आ जाते थे, लेकिन अब बच्चों को ही पतंग उड़ाने का शौक नहीं है। महजबीन बेगम ने बताया कि मैं ही पतंग बनाकर महीने में ढाई से तीन हजार रुपये कमा लेती हूं, बच्चे तो अब दूसरा रोजगार कर रहे हैं।
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