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Rinku Singh Father Death: अधूरा रहा पिता का ये अरमान, गरीबी के बोझ के नीचे दबकर भी न टूटने दिए बेटे के ख्वाब

अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़ Published by: Sharukh Khan Updated Sat, 28 Feb 2026 09:56 AM IST
सार

क्रिकेटर रिंकू सिंह के पिता खानचंद का सपना अधूरा रह गया। रिंकू को सेहरा बांधने का अरमान पूरा नहीं हो पाया। लीवर कैंसर के स्टेज-4 से पीड़ित खानचंद का शुक्रवार सुबह निधन हो गया।

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Rinku Singh Father Death Father Khanchand wish to see Rinku Singh as a groom remained unfulfilled
Rinku Singh Father Death - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
क्रिकेट की दुनिया में प्रशंसक आज जिस फिनिशर रिंकू सिंह के छक्कों पर झूमती है, उनको इस मुकाम तक पहुंचाने वाले रिंकू सिंह के पिता का एक सपना अधूरा रह गया। हर पिता की तरह खानचंद की आंखों में भी एक सपना था कि जिस बेटे रिंकू सिंह ने दुनिया जीती है, उसे सेहरा बांधे देख सकें। नियति का खेल देखिए उसकी शादी का सपना सीने में दबाए ही पिता विदा हो गए।


यह कसक आज रिंकू और उनके पूरे परिवार को अंदर तक छलनी कर रही है। रिंकू सिंह की शादी टी-20 विश्व कप के बाद मछली शहर की सांसद प्रिया सरोज से होनी है। प्रिया सरोज के साथ उनकी मंगनी हो चुकी है।
 
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रिंकू सिंह के पिता का निधन - फोटो : Instagram
अलीगढ़ की तंग गलियों में साइकिल पर भारी गैस सिलिंडर लादकर घर-घर पहुंचाने वाले खानचंद का शुक्रवार को निधन हो गया। वे अपने पीछे सफलता की एक ऐसी इबारत छोड़ गए हैं, जो केवल पसीने और एक पिता के अडिग विश्वास से लिखी गई थी। 
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रिंकू सिंह के पिता का निधन - फोटो : Instagram
उन्होंने गरीबी के बोझ के नीचे दबकर भी बेटे के अरमानों को झुकने नहीं दिया। दो कमरों के मामूली मकान में रहने वाले खानचंद दिन भर सिलिंडर ढोकर जो चंद रुपये कमाते, उनसे वे रिंकू के लिए गेंद और बल्ले का इंतजाम करते थे।

 
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रिंकू सिंह के पिता खानचंद की फाइल फोटो और मोक्षधाम में रिंकू सिंह - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
रिंकू ने फटे जूतों और तंगहाली के बीच तय किया नीली जर्सी तक का सफर
कोच मसूद जफर अमीनी भावुक होकर याद करते हैं कि कैसे खानचंद खुद रिंकू का हाथ थामकर अहिल्याबाई होल्कर स्टेडियम लाए थे। वह पिता का ही हौसला था कि रिंकू ने फटे जूतों और तंगहाली के बीच अंडर-16 से लेकर टीम इंडिया की नीली जर्सी तक का सफर तय किया।

 
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रिंकू सिंह और उनके माता-पिता - फोटो : Rinku Singh (instagram)
एक दौर वह भी था जब रिंकू खुद पिता का हाथ बंटाने के लिए कभी-कभार बाइक पर सिलिंडर पहुंचा देते थे, लेकिन खानचंद ने हमेशा कोशिश की कि रिंकू का ध्यान खेल से न भटके। उन्होंने ताउम्र मेहनत की ताकि उनका बेटा सिर्फ मैदान पर पसीना बहाए। रिंकू के कामयाब होने के बाद भी खानचंद का संघर्ष के प्रति सम्मान कम नहीं हुआ।
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