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जन्मदिन पर किसी को नहीं आई परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद की याद
Sun, 02 Jul 2017 10:51 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, गाजीपुर
ब्यूरो, अमर उजाला, गाजीपुर
Updated Sun, 02 Jul 2017 10:51 AM IST
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Veer Abdul Hamid
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पाकिस्तान के साथ 1965 की जंग में अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अमेरिकी पैटन टैंकों को नष्ट करने वाले परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद को उनके जन्मदिन पर किसी ने याद नहीं किया। देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की कुर्बानी देने वाले इस जांबाज को इस वर्ष उसके जन्मदिन पर भुला दिया गया।
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गाजीपुर शहर में कौन कहे उनके पैतृक गांव धामूपुर में भी किसी को उनकी याद नहीं आई। वर्ष 1965 में भारत-पाक के बीच हुए युद्घ के दौरान अपने अदम्य साहस का लोहा मनवाने वाले इस जांबाज का जन्म धामूपुर में पहली जुलाई 1933 को एक सामान्य दर्जी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम उस्मान एवं माता का नाम बकरीदन था। अब्दुल हमीद की बचपन से ही देश की सेवा करने की हसरत थी।
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अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए वह 22 दिसंबर 1954 को वाराणसी में जाकर फौज में भर्ती हो गए। वर्ष 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया। इस युद्घ में हमीद को अपनी वीरता दिखाने का मौका मिला। इस युद्घ में बहादुरी दिखाने पर उन्हें जवान अब्दुल हमीद की जगह लांस नायक अब्दुल हमीद बना दिया।
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12 मार्च 1962 के बाद उन्हें तीन वर्षो के अंदर ही नायक, हवलदार और कंपनी क्वार्टर मास्टर की उपाधी हासिल हो गई। वर्ष 1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए युद्घ में उन्हें जांबाजी दिखाने का मौका मिला। पाकिस्तान को अपने पैंटन टैंकों पर बहुत नाज था। वीर अब्दुल हमीद पंजाब के तरन तारन जिले खेमकरन सेक्टर में सेना की अग्रिम पंक्ति में तैनात थे।
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भारतीय सैनिक बहादुरी के साथ पैंटन-टैंकों का सामना करने लगे। वीर अब्दुल हमीद ने अपनी गन से सटीक निशाना साधते हुए एक-एक कर पैंटन टैंकों को ध्वस्त करना प्रारंभ कर दिया। देखते ही देखते पाकिस्तान फौज में भगदड़ मच गई। खेमकरन सेक्टर में अद्भूत वीरता का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने वीरगति प्राप्त की। इसके लिए उन्हें मरणोपरांत देश का सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया गया। सर्वोच्च सैन्य सम्मान प्राप्त करने वाले ऐसे सपूत के जन्म दिन पर शहर सहित उनके पैतृक गांव में कोई कार्यक्रम तक आयोजित नहीं किया गया।
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