रात के दो बजे। गंगा के तट पर रऊवा से एहे हथजोरिया नु हो, आदित करि जनि देरिया... की तान गंगा की लहरों के साथ-साथ श्रद्धालुओं की प्रार्थना को आदिदेव तक पहुंचा रही थी। मां गंगा का अर्धचंद्राकार किनारा श्रद्धालुओं की गुहार से रात्रि के अंधकार में श्रद्धा के प्रकाश की लौ जगा रहा था। वेदी पर जल रहा अखंड दीप हल्की सर्द हवाओं के साथ-साथ झिलमिला रहा था। जैसे-जैसे रात ढल रही थी, श्रद्धालुओं की आतुरता भी बढ़ती जा रही थी।
तस्वीरों में काशी की छठ पूजा: आदिदेव ने व्रतियों को कराया 23 मिनट का इंतजार, देखें- घाटों पर छठ की छटा
सोमवार की भोर में काशी के घाट, कुंड और सरोवरों का नजारा पूरी तरह से बदल चुका था। कहीं छठी मइया का विदाई गीत हमनी के छोड़ के नगरिया नू हो, कहवां जइबू ए माई, कईसे करी हम विदाई...विछोह का भाव जगा रही थी तो वहीं भगवान सूर्य की प्रतीक्षा में कातर नजरें पूरब की ओर निहार रही थीं।
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पांच बजने के बाद भी घाटों पर हल्का कोहरा और अंधेरे की चादर तनी हुई थी। श्रद्धालुओं की नजरें भगवान भास्कर के आगमन की प्रतीक्षा में बार-बार पूरब की तरफ ही उठ रही थीं। सूर्याेदय का समय सुबह 6:08 बजे था, पौ तो फट गई लेकिन कोहरे के कारण सूर्य भगवान के दर्शन नहीं हुए। पौ फटने के साथ ही घाट, कुंडों और सरोवरों पर हलचल बढ़ने लगी। महिलाएं पूजा करने के बाद अपने-अपने सूप लेकर पानी में खड़े होकर भगवान सूर्य का इंतजार करने लगीं। श्रद्धालुओं को लगभग 23 मिनट का इंतजार करना पड़ा और जैसे ही भगवान भास्कर लालिमा के साथ पूरब में नजर आए तो अस्सी से राजघाट तक हर-हर महादेव का जयघोष गुंजायमान हो उठा। छठ के अनुष्ठान, पूजन आरंभ हो गए। महिलाओं ने दूध से उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया। गन्ने के मंडप के बीच दीपक जलाकर पूजा अर्चना करने वाली व्रती महिलाओं के परिवार वालों ने बारी-बारी अर्घ्य दिया। भगवान को फल, सब्जियों सहित विभिन्न प्रकार के पकवानों का भोग लगाकर आरती उतारी। सुहागिन व्रती महिलाओं ने एक दूसरे के माथे पर सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य होने का आशीर्वाद दिया। पूजा समाप्त होने के बाद प्रसाद लेने की होड़ मच गई। गंगा तट से लेकर गोदौलिया चौराहे तक कई लोग छठ का प्रसाद लेने केलिए हाथ फैलाए खड़े रहे। ऐसा ही नजारा बरेका सूर्य सरोवर, शास्त्री घाट, अस्सी घाट, राजघाट समेत गोमती के किनारे भी रहा।
एक तरफ नेमी कर रहे थे स्नान, दूसरी ओर चल रहे थे छठ के अनुष्ठान
गंगा के तट पर एक तरफ भोर में तीन बजे से ही कार्तिक का स्नान करने वाले नेमियों की कतार लगी थी। काशी विश्वनाथ की मंगला आरती में शामिल होने वाले नेमियों की कतार गंगा स्नान के लिए बढ़ने लगी। घाट की सीढि़यों पर छठ व्रतियों की भीड़ के कारण किसी तरह रास्ता बनाते हुए सीढि़यों से नीचे उतरे। स्नान के बाद ऊं नम: शिवाय का जाप करते हुए मंदिर की ओर बढ़ चले। बाबा विश्वनाथ की मंगला आरती जैसे ही समाप्त हुई तो श्रद्धालुओं ने घाटों का रूख कर लिया।
मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र पर नजारा था अलग
काशी को राग और विराग की नगरी यूं ही नहीं कही जाती है। एक तरफ श्रद्धालु जहां संतति और कुल की वृद्धि के लिए छठी मइया का पूजन और भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर मणिकर्णिका व हरिश्चंद्र घाट पर अंतिम संस्कार करने वालों की भी कतार लगी थी।
उगते सूर्य को अर्घ्य देकर छठ पूजा हुआ समापन
वाराणसी। नमो घाट पर उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रती महिलाओं ने छठ पूजा का समापन किया। सोमवार को गंगा की लहरों पर जैसे ही भगवान भास्कर की पहली किरण पड़ी तो घाट पर मौजूद आस्थावानों ने दिनकर काे प्रणाम कर पूजन अर्चन शुरु किया। नमो घाट, राजघाट, प्रह्लाद घाट, रानी घाट, गोला घाट, गाय घाट समेत पक्के महाल के अन्य घाटों पर लाखों सूर्य उपासकों ने दूध का अर्घ्य देकर सूर्य देव से घर-परिवार के सुख शांति और समृद्धि की कामना की। भगवान सूर्य की करणें गंगा की लहरों से होते हुए घाट की सीढ़ियों की ओर बढ़ती गईं और व्रती महिलाएं और उनके परिजन पूजन समाप्त कर हाथ में जलता दीप और छठी मइया का गीत गाते हुए अपने घरों की ओर लौट गए। सुबह के समय घाटों पर शाम के अपेक्षा भीड़ कम थी।
लोक आस्था का महापर्व डाला छठ 17 नवंबर से शुरु हुआ। व्रती महिलाओं ने भगवान भास्कर की चार दिनों तक पूजन अर्चन किया। पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन 19 नवंबर को संध्या अर्घ्य और चौथे दिन 20 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ महापर्व छठ का समापन हुआ।
उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए सोमवार को भोर से सोसाइटियां और कॉलोनियां गुलजार दिखीं। कहीं छत पर तो कहीं आंगन में व्रती महिलाओं ने छठ के अनुष्ठान पूरे कर सूर्य भगवान को अर्घ्य दिया। छत पर बाथिंग टब तो कहीं कॉलोनियों में बने अस्थायी कुंड के पानी में खड़े होकर उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत पूरा किया। भगवानपुर निवासी सावित्री ने बताया कि पांच बजे से पूजा पाठ शुरू हो गया था। घर के बाहर बने कुंड के पानी में खड़ी होकर सूर्योदय का इंतजार कर रही थी। सूर्योदय होते ही अर्घ्य दिया और व्रत किया। उधर शहर के अलग अलग सोसाइटी में महिलाओं ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत पूरा किया।