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Health: एक ऐसी डिवाइस जो पता लगाती है दिमागी बीमारियां, डॉक्टरों का बड़ा दावा; बच्चों की मृत्युदर घटी
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: आगरा ब्यूरो
Updated Mon, 02 Mar 2026 02:00 PM IST
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सार
नई ब्रेन मॉनिटरिंग तकनीक से गंभीर बच्चों की हालत पर सटीक नजर रखकर इलाज संभव हो रहा है, जिससे मृत्युदर में कमी आई है। विशेषज्ञों ने बच्चों में टीबी जांच की नई विधि और एंटीबायोटिक के दुरुपयोग पर भी चिंता जताई।
चिकित्सक
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
तकनीक से बीमारियों की जांच, इलाज और सर्जरी बेहद आसान हो रही है। अब ऐसी डिवाइस उपयोग हो रही हैं, जिससे दिमागी बीमारियों को आसानी से पता कर इलाज किया जा सकेगा। इससे अतिगंभीर मरीजों की मृत्युदर कम की जा सकेगी। माल रोड स्थित होटल में इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की कार्यशाला में डॉक्टरों ने व्याख्यान दिए।
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पीजीआई चंडीगढ़ के बाल रोग विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सुनित सिंघी ने बताया कि पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (पीआईसीयू) में भर्ती 110 बच्चों पर अध्ययन किया। इसमें एक एमएम की डिवाइस कैथेटर से दिमाग में पहुंचाया। इससे ऑक्सीजन की मात्रा, रक्त का संचार, बेहोश होने पर मस्तिष्क के संचालन समेत अन्य की जानकारी मॉनीटर के जरिये रिकॉर्ड कीं। इसके आधार पर इलाज कर 55 बच्चों की जान बच गई। ये काफी बेहतर दर है। नेशनल पीडियाट्रिक इंफेक्शन डिजीस एकेडमी के अध्यक्ष डॉ. संजय घोरपड़े ने बताया कि दिमागी संक्रमण और बुखार से बच्चों में दौरे की भी परेशानी बढ़ रही है। कार्यशाला में डॉ. अजय कालरा, डॉ. जेएन टंडन, डॉ. पंकज कुमार, डॉ. अनीता हेगड़े, डॉ. बाला सुब्रह्मण्यम, डॉ. आरएन शर्मा, डॉ. एनसी प्रजापति आदि मौजूद रहे।
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बच्चों के मल से टीबी की जांच की खोज
इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ ट्रॉपिकल पीडियाट्रिक्स के अध्यक्ष डॉ. राजेश्वर दयाल ने बताया कि बच्चों में बलगम से टीबी की पता लगाना कठिन है। उन्होंने शोध कर बच्चों के मल से भी सीबीनेट के जरिये बीमारी पता लगाई। ऐसे ही रीढ़ की हड्डी से पानी निकालकर टीबी लैंप से भी पता लगाया है। इससे टीबी का जल्द उपचार शुरू हो सका।
इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ ट्रॉपिकल पीडियाट्रिक्स के अध्यक्ष डॉ. राजेश्वर दयाल ने बताया कि बच्चों में बलगम से टीबी की पता लगाना कठिन है। उन्होंने शोध कर बच्चों के मल से भी सीबीनेट के जरिये बीमारी पता लगाई। ऐसे ही रीढ़ की हड्डी से पानी निकालकर टीबी लैंप से भी पता लगाया है। इससे टीबी का जल्द उपचार शुरू हो सका।
एंटीबायोटिक की गाइडलाइन बनाने को भेजा पत्र
आयोजन अध्यक्ष डॉ. राकेश भाटिया ने बताया कि बुखार-खांसी, जुकाम में भी एंटीबायोटिक दवाएं दी जा रही है। इससे ये रेसिस्टेंट हो रही हैं। बीते 20 साल में कोई नई एंटीबायोटिक दवा की खोज नहीं की है। ऐसे में सरकार को एंटीबायोटिक के लिए चिकित्सक का पर्चा जरूरी करने का सुझाव दिया है।
आयोजन अध्यक्ष डॉ. राकेश भाटिया ने बताया कि बुखार-खांसी, जुकाम में भी एंटीबायोटिक दवाएं दी जा रही है। इससे ये रेसिस्टेंट हो रही हैं। बीते 20 साल में कोई नई एंटीबायोटिक दवा की खोज नहीं की है। ऐसे में सरकार को एंटीबायोटिक के लिए चिकित्सक का पर्चा जरूरी करने का सुझाव दिया है।
