AMU: खेती की जमीन उपयोग में पश्चिम के किसान आगे, बुंदेलखंड-पूर्वी यूपी के पीछे, असमानता की खाई पाटना चुनौती
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के अर्थशास्त्र विभाग में शोध हुआ है कि अगर गांवों की बुनियादी सुविधाएं मजबूत हों, तो खेती की पैदावार में बड़ा सुधार हो सकता है।
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सूबे में खेती के लिए जमीन के उपयोग के मामले में पश्चिम क्षेत्र के किसान आगे हैं और बुंदेलखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान पीछे हैं। कृषि क्षेत्र में असमानता की खाई को पाटने की बड़ी चुनौती है। यह खुलासा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के अर्थशास्त्र विभाग में हुए शोध में हुआ है। इसमें कहा गया है कि अगर गांवों की बुनियादी सुविधाएं मजबूत हों, तो खेती की पैदावार में बड़ा सुधार हो सकता है।
अर्थशास्त्र विभाग के प्रो. अब्दुस सलाम के निर्देशन में शोधार्थी जीशान अनीस खान ने वर्ष 1998-99 से 25 वर्षों के जिला स्तरीय आंकड़ों का अध्ययन किया। हाल ही में इसकी रिपोर्ट जारी की गई। प्रदेश को पश्चिमी, मध्य, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड-चार हिस्सों में बांटकर खेती और सुविधाओं की स्थिति का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया। इसमें पश्चिमी में 30, पूर्वी यूपी में 28, मध्य क्षेत्र में 10 जिले और बुंदेलखंड के सात जिलों को शामिल किया गया।
इसमें बताया गया कि राज्य का कुल फसल क्षेत्र 1998-99 में 24.90 मिलियन हेक्टेयर था, जो 2010-11 में बढ़कर 25.61 और 2021-22 में बढ़कर 28.35 मिलियन हेक्टेयर हो गया। 2021-22 में, पश्चिमी क्षेत्र के किसानों ने लगभग 76 फीसदी, मध्य क्षेत्र में 67 फीसदी, पूर्वी क्षेत्र ने 64 और बुंदेलखंड क्षेत्र में 65 फीसदी भूमि में खेती गई। इसके बावजूद राज्य भर में शुद्ध बोए गए क्षेत्र में मामूली गिरावट देखी गई। यह कमी बुंदेलखंड और पूर्वी क्षेत्रों में सबसे अधिक देखी गई। पश्चिमी क्षेत्र में शुद्ध बोए गए क्षेत्र का स्तर लगातार उच्च बना रहा।
उत्तर प्रदेश में 1998-99 से 2021-22 तक राज्य और इसके विभिन्न क्षेत्रों में वन क्षेत्र अपेक्षाकृत स्थिर रहा है। राज्य स्तर पर वन क्षेत्र में मामूली वृद्धि दर्ज की गई, जो 7.1 फीसदी से बढ़कर 7.5 फीसदी हो गया। पश्चिमी क्षेत्र में 4.6 फीसदी से 5.1 फीसदी तक की वृद्धि हुई, जबकि पूर्वी क्षेत्र में स्थिर रहा। बुंदेलखंड का वन क्षेत्र 7.8 फीसदी से बढ़कर 9.6 फीसदी हो गया।
कई जिलों में सड़कें तो बेहतर हो गई हैं, लेकिन बाजार और कर्ज की सुविधाएं अब भी कमजोर हैं। इससे किसानों को उनकी फसल का सही दाम और समय पर आर्थिक मदद नहीं मिल पा रही है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में सुधार जरूर दिखा है, लेकिन बुंदेलखंड अभी भी पीछे है। बुंदेलखंड में पानी बचाने और सूखा सहने वाली तकनीकों पर ध्यान दिया जाए, जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश में बेहतर सिंचाई और किसानों को नई तकनीक सिखाने की जरूरत है।-प्रो. अब्दुस सलाम, अर्थशास्त्र विभाग, एएमयू
सिंचाई के तरीकों में बदलाव, भूजल स्तर गिरना चिंताजनक
पहले किसान नहरों पर ज्यादा निर्भर थे, लेकिन अब ट्यूबवेल का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। पश्चिमी और मध्य उत्तर प्रदेश में यह बदलाव ज्यादा देखने को मिला है। इससे भूजल स्तर गिरने की चिंता भी बढ़ गई है। बुंदेलखंड क्षेत्र अब भी किसान तालाब और अन्य सतही जल स्रोतों पर निर्भर है।
इन जिलों पर किया गया अध्ययन
पश्चिमी क्षेत्र
सहारनपुर, मुज़फ्फरनगर, शामली, बिजनौर, मुरादाबाद, संभल, रामपुर, अमरोहा, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, हापुड़, गौतम बुद्ध नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, हाथरस, मथुरा, आगरा, फिरोजाबाद, एटा, कासगंज, मैनपुरी, बदायूं, बरेली, पीलीभीत, शाहजहांपुर, फर्रुखाबाद, कन्नौज, इटावा, औरैया है।
मध्य क्षेत्र
खीरी, सीतापुर, हरदोई, उन्नाव, लखनऊ, रायबरेली, कानपुर देहात, कानपुर, फतेहपुर, बाराबंकी, बुंदेलखंड, जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा, बांदा, चित्रकूट।
पूर्वी क्षेत्र
प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद,फैजाबाद, अंबेडकर नगर, सुल्तानपुर, अमेठी, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, गोंडा, सिद्धार्थ नगर, बस्ती, संत कबीर नगर, महराजगंज, गोरखपुर, कुशीनगर,देवरिया,आजमगढ़,मऊ,बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली,वाराणसी, संत रविदास नगर, मिर्जापुर, सोनभद्र हैं।
