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Aligarh News: कचरे में नहीं जाएगी राखी, मिट्टी में जाते ही बनेगी पौधा
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अतरौली के गांव खेड़ाबाद में राखी बनातीं महिलाएं। संवाद
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अतरौली के गांव खेड़ाबाद नगलिया की महिलाएं भाई-बहन के प्रेम के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रही हैं। गांव की अलका वर्मा के नेतृत्व में जय शनि देव स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने इस बार ऐसी सीड राखी (बीज वाली राखी) तैयार की है, जो बाद कचरे में नहीं जाएगी, बल्कि मिट्टी में जाते ही कुछ समय बाद पौधे का रूप ले लेगी।
समूह संचालिका अलका वर्मा ने बताया कि सामान्य राखियां त्योहार के बाद कचरे में चली जाती हैं, जिससे प्रदूषण बढ़ता है। इसी समस्या को देखते हुए महिलाओं ने पर्यावरण के अनुकूल राखियां बनाने का निर्णय लिया। इन राखियों को तैयार करने में मिट्टी, हैंडमेड पेपर और सूती-रेशमी कलावे का प्रयोग किया गया है।
इन विशेष राखियों में तुलसी, गेंदा, टमाटर और मिर्च जैसे उपयोगी एवं औषधीय पौधों के बीज लगाए गए हैं। रक्षाबंधन के बाद भाई इन राखियों को गमले या बगीचे की मिट्टी में लगा सकते हैं, जहां कुछ समय बाद पौधे विकसित हो जाएंगे।
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अलका वर्मा ने बताया कि इस पहल का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के साथ ग्रामीण महिलाओं को रोजगार से जोड़ना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। स्वयं सहायता समूह की महिलाएं मेहनत से इन राखियों को तैयार कर रही हैं और बाजार में भी इनकी मांग भी बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण के अनुकूल राखियों को अपनाने से रक्षाबंधन का त्योहार रिश्तों की मिठास के साथ प्रकृति के संरक्षण का संदेश भी देगा। जय शनि देव स्वयं सहायता समूह की यह पहल महिला सशक्तीकरण और सामाजिक सरोकार का प्रेरणादायक उदाहरण बन रही है।
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समूह संचालिका अलका वर्मा ने बताया कि सामान्य राखियां त्योहार के बाद कचरे में चली जाती हैं, जिससे प्रदूषण बढ़ता है। इसी समस्या को देखते हुए महिलाओं ने पर्यावरण के अनुकूल राखियां बनाने का निर्णय लिया। इन राखियों को तैयार करने में मिट्टी, हैंडमेड पेपर और सूती-रेशमी कलावे का प्रयोग किया गया है।
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इन विशेष राखियों में तुलसी, गेंदा, टमाटर और मिर्च जैसे उपयोगी एवं औषधीय पौधों के बीज लगाए गए हैं। रक्षाबंधन के बाद भाई इन राखियों को गमले या बगीचे की मिट्टी में लगा सकते हैं, जहां कुछ समय बाद पौधे विकसित हो जाएंगे।
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अलका वर्मा ने बताया कि इस पहल का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के साथ ग्रामीण महिलाओं को रोजगार से जोड़ना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। स्वयं सहायता समूह की महिलाएं मेहनत से इन राखियों को तैयार कर रही हैं और बाजार में भी इनकी मांग भी बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण के अनुकूल राखियों को अपनाने से रक्षाबंधन का त्योहार रिश्तों की मिठास के साथ प्रकृति के संरक्षण का संदेश भी देगा। जय शनि देव स्वयं सहायता समूह की यह पहल महिला सशक्तीकरण और सामाजिक सरोकार का प्रेरणादायक उदाहरण बन रही है।