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Good News: यूपी का दूसरा एटॉमिक पॉवर प्लांट अब होगा अलीगढ़ मंडल में, तलाशी जा रही ऐसी जमीन, जहां पानी हो भरपूर

Tue, 04 Aug 2026 10:53 AM IST
Chaman Kumar Sharma दीपक शर्मा, अमर उजाला, अलीगढ़
दीपक शर्मा, अमर उजाला, अलीगढ़ Published by: Chaman Kumar Sharma Updated Tue, 04 Aug 2026 10:53 AM IST
सार

संयंत्र के लिए ऐसी जमीन की तलाश की जा रही है जहां भूकंप की तीव्रता की संभावना रिक्टर पैमाने पर पांच से कम हो। साथ ही नदी के रूप में पर्याप्त पानी की उपलब्धता हो।

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UP second atomic plant Aligarh division
परमाणु ऊर्जा संयत्र - फोटो : एआई

विस्तार

लगातार बढ़ रही बिजली की मांग को पूरा करने के लिए अलीगढ़ मंडल में परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की तैयारी है। यह प्रदेश का दूसरा परमाणु ऊर्जा संयंत्र होगा। इसके लिए मंडल भर में 180 एकड़ जमीन की तलाश शुरू कर दी गई है। इसके लिए अलीगढ़ मंडल के अपर आयुक्त (प्रथम) अखिलेश यादव ने अलीगढ़, एटा, हाथरस और कासगंज के जिलाधिकारियों को पत्र जारी किया है।

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संयंत्र के लिए ऐसी जमीन की तलाश की जा रही है जहां भूकंप की तीव्रता की संभावना रिक्टर पैमाने पर पांच से कम हो। साथ ही नदी के रूप में पर्याप्त पानी की उपलब्धता हो। न्यूक्लियर पॉवर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) की ओर से प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना के लिए निर्धारित मानकों के अनुरूप ही जमीन का चयन किया जाना है।
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इस संबंध में आयुक्त एवं सचिव, राजस्व परिषद ने 24 जुलाई 2026 को पत्र लिखकर स्थानीय प्रशासन को जमीन की तलाश के संबंध में निर्देश दिया था। यह मामला ऊर्जा विकास और उच्च प्राथमिकता से जुड़ा है इसलिए अपर आयुक्त ने सभी संबंधित जिलों अलीगढ़, एटा, हाथरस और कासगंज के जिलाधिकारियों को निर्देश जारी किए हैं। उनसे कहा कि वह एनपीसीआईएल के मानकों के अनुसार अपने जिलों में संयंत्र के मानकों के अनुरूप जमीन की तलाश करें।

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न्यूक्लियर पॉवर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के मानकों के अनुसार जमीन की तलाश के लिए चारों जिलों के प्रशासन को पत्र लिखा गया है। 180 एकड़ जमीन ऐसी चाहिए जो भूकंप तीव्रता के पैमाने पर पांच से नीचे की आशंका वाली हो। साथ ही पानी भी उपलब्ध हो। जमीन मिलने के बाद सारा विवरण शासन और कॉरपोरेशन को भेज दिया जाएगा। -अखिलेश यादव, अपर आयुक्त, अलीगढ़ मंडल

नरौरा में है 440 मेगावाट क्षमता का परमाणु संयंत्र
प्रदेश का एक मात्र परमाणु ऊर्जा संयंत्र जिला बुलंदशहर के नरौरा में है। इसमें 220-220 मेगावाट की दो यूनिट कार्यरत हैं जिनकी कुल क्षमता 440 मेगावाट है। यह गंगा के किनारे पर स्थित है। इसका संचालन एनपीसीआईएल की ओर से किया जाता है।

तापमान को नियंत्रित करने के लिए होती है पानी की जरूरत
परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को हमेशा नदियों, झीलों या समुद्र के किनारे बनाने के पीछे मुख्य वजह संयंत्र के तापमान को सुरक्षित बनाए रखना है। परमाणु संयंत्रों में बिजली बनाने की प्रक्रिया कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट जैसी ही होती है। इसमें यूरेनियम के विखंडन से अत्यधिक गर्मी पैदा की जाती है जिससे पानी को उबालकर भाप बनाई जाती है। यह भाप टरबाइन को घुमाती है जिससे बिजली बनती है। टरबाइन को घुमाने के बाद उस भाप को दोबारा ठंडा कर पानी में बदलना पड़ता है जिसके लिए लगातार ठंडे पानी की बड़ी मात्रा की आवश्यकता होती है।

शुरुआती निवेश अधिक, दीर्घकाल में सस्ती ऊर्जा 
एएमयू के भौतिकी विभाग के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. वसी हैदर कहते हैं कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने में शुरुआती निवेश अधिक है लेकिन दीर्घकाल में यही सस्ती पड़ती है। इसके उपयोग से पर्यावरण और बिजली उत्पादन के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण लाभ मिलते हैं। सबसे बड़े फायदों में से एक यह है कि इसके उत्पादन के दौरान ग्रीनहाउस गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं होता है। कोयला या गैस आधारित थर्मल पावर प्लांटों की तरह यह जलवायु परिवर्तन या ग्लोबल वार्मिंग में योगदान नहीं देता है।

परमाणु ईंधन की बहुत कम मात्रा से अत्यधिक मात्रा में बिजली का उत्पादन किया जा सकता है। एक छोटा सा यूरेनियम का टुकड़ा कोयले की मीलों बड़ी खेप के बराबर ऊर्जा पैदा कर सकता है। एक बार परमाणु संयंत्र बन जाने के बाद यह कई दशकों (लगभग 40 से 60 साल या उससे अधिक) तक बिना रुके कुशलतापूर्वक काम कर सकता है।

1977 में शुरू हुआ था नरौरा केंद्र का निर्माण
बुलंदशहर के कस्बा नरौरा में नरौरा परमाणु ऊर्जा केंद्र का निर्माण कार्य 1 नवंबर 1977 को शुरू हुआ था। जबकि इसकी पहली इकाई ने 1 जनवरी 1991 को वाणिज्यिक उत्पादन शुरू किया था। 1 जुलाई 1992 को दूसरी यूनिट से उत्पादन शुरू हुआ। यह स्वदेशी डिजाइन, उन्नत दबाव युक्त और भारी जल आधारित है।

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