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High Court :हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी हटाई, कहा-नैतिक भ्रष्टाचार का ठोस आधार जरूरी

Wed, 22 Jul 2026 04:50 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 22 Jul 2026 04:50 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी की वार्षिक गोपनीय आख्या (एसीआर) में दर्ज ‘संदिग्ध ईमानदारी’ संबंधी प्रतिकूल टिप्पणी को निरस्त कर दिया है।

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High Court expunges adverse remarks against judicial officer; states concrete grounds for moral turpitude
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी की वार्षिक गोपनीय आख्या (एसीआर) में दर्ज ‘संदिग्ध ईमानदारी’ संबंधी प्रतिकूल टिप्पणी को निरस्त कर दिया है। स्पष्ट किया कि किसी न्यायिक अधिकारी की ईमानदारी पर सवाल उठाने वाली टिप्पणी केवल व्यवहार संबंधी शिकायतों, कार्यशैली या न्यायिक आदेशों में कथित त्रुटियों के आधार पर नहीं की जा सकती। ऐसी गंभीर टिप्पणी के लिए अधिकारी के चरित्र में नैतिक भ्रष्टाचार या बेईमानी से जुड़ा ठोस आधार होना आवश्यक है। यह आदेश न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने एक न्यायिक अधिकारी की याचिका पर दिया है।

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देवरिया निवासी याची ने 2019-20 की एसीआर में दर्ज प्रतिकूल टिप्पणियों को चुनौती दी थी। याची उस समय गाजियाबाद में अपर सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर कार्यरत थीं। उनकी एसीआर में उनकी ईमानदारी को ‘संदिग्ध’ बताते हुए कहा गया था कि अधिवक्ताओं की ओर से उनके कार्य और आचरण को लेकर मौखिक शिकायतें मिली थीं। एसीआर में यह भी टिप्पणी की गई थी कि अधिकारी की अच्छी प्रतिष्ठा नहीं है। बार के कई सदस्य उनके व्यवहार को लेकर शिकायत करते थे। अन्य कई आरोप लगाए गए थे।
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हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विजय सिंह बनाम उत्तर प्रदेश में दिए गए फैसले का जिक्र किया। जिसमें कहा गया है कि ईमानदारी का संबंध मजबूत नैतिक सिद्धांतों, सत्यनिष्ठा, निष्कलंक चरित्र और भ्रष्ट प्रभाव से मुक्त आचरण से है। लापरवाही, अनजाने में हुई गलती या असावधानी मात्र से किसी व्यक्ति की ईमानदारी संदिग्ध नहीं हो जाती।
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हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के न्यायिक आदेशों में त्रुटि या किसी कानूनी निष्कर्ष से असहमति का उपचार अपील या पुनरीक्षण की प्रक्रिया में हो सकता है। ऐसे न्यायिक निर्णयों की गुणवत्ता को अधिकारी की व्यक्तिगत ईमानदारी से जोड़ना उचित नहीं है। कोर्ट ने ‘संदिग्ध ईमानदारी’ संबंधी टिप्पणी को निरस्त कर दिया। साथ ही याची को आवश्यक परिणामी राहत देने का निर्देश दिया गया।

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