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High Court : गुजारा-भत्ता का आदेश लागू कराने के लिए किसी की स्वतंत्रता और सम्मान को न कुचले फैमिली कोर्ट

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 01 Feb 2026 05:50 PM IST
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सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बकाया भरण-पोषण वसूली के मामले में कहा कि इसका भुगतान करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति कोई अपराधी नहीं है। इसलिए उसके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए।

High Court: Family Court should not trample upon anyone's liberty and dignity to enforce alimony orders.
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बकाया भरण-पोषण वसूली के मामले में कहा कि इसका भुगतान करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति कोई अपराधी नहीं है। इसलिए उसके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। फैमिली कोर्ट (परिवार न्यायालय) को आदेश लागू कराने के उत्साह में आकर कानून की मर्यादा और व्यक्ति की गरिमा को नहीं कुचलना चाहिए। बकाये की वसूली के लिए किसी व्यक्ति के खिलाफ सीधे गिरफ्तारी वारंट जारी करना कानूनी रूप से गलत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है। यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने भरण-पोषण मामले में जारी गिरफ्तारी वारंट को रद्द कर दिया।

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अलीगढ़ के फैमिली कोर्ट ने मोहम्मद शहजाद के खिलाफ वसूली और गिरफ्तारी वारंट एक साथ जारी किए थे। याची ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए याचिका दायर की। कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा-125(3) के तहत वसूली की एक निश्चित प्रक्रिया है, जिसका पालन अनिवार्य है। इसके तहत कोई व्यक्ति भरण-पोषण की राशि देने में विफल रहता है तो पहले उस पर जुर्माना लगाने और संपत्ति कुर्क करके बकाया वसूलने का प्रयास किया जाना चाहिए।
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कानून में यह कहीं नहीं है कि वसूली और गिरफ्तारी वारंट एक साथ जारी कर दिए जाएं। कारावास की सजा केवल तभी दी जा सकती है, जब वारंट निष्पादन के बावजूद राशि अपर्याप्त रह जाए। यह फैसला सर्वोच्च न्यायालय की ओर से ‘रजनीश बनाम नेहा’ मामले में दी गई व्यवस्था के अनुरूप है, जो स्पष्ट करता है कि जेल भेजना अंतिम विकल्प होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि वसूली की प्रक्रिया चरणों में होनी चाहिए। पहले संबंधित व्यक्ति को नोटिस जारी कर पर्याप्त कारण बताने का अवसर देना आवश्यक है। यदि व्यक्ति वेतनभोगी है तो यूपी फैमिली कोर्ट रूल्स के तहत उसके वेतन की कुर्की की जा सकती है पर सीधे जेल भेजना उसके मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है। इसी आधार पर कोर्ट ने अलीगढ़ के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश को मामले को वापस भेजते हुए निर्देश दिया है कि वे कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए और प्रक्रिया का पालन करते हुए नए सिरे से निर्णय लें।

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