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UP: फ्रिज से निकली थी मौत की चिंगारी; 40 साल बाद भी नहीं बुझी कत्ल की आग, भाई ही था भाई का कसाई, पढ़ें मामला

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: Himanshu Awasthi Updated Thu, 11 Jun 2026 05:52 AM IST
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सार

Kanpur Crime News: कानपुर के परेड में 1983 में महिला मित्र से विवाद पर भाई की हत्या करने वाले विजय सिंह की अपील को हाईकोर्ट ने खारिज कर उम्रकैद बरकरार रखी है। हालांकि, चश्मदीद भाई-भाभी कोर्ट में गवाही से मुकर गए थे, लेकिन अन्य साक्ष्यों के आधार पर सजा सही पाई गई और अब 71 वर्ष के हो चुके दोषी को सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल जमानत मिली है।

Kanpur parade massacre fire of murder hasnt died out even after 40 years brother turned butcher to his brother
सांकेतिक - फोटो : amar ujala
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विस्तार

भाई की हत्या के दोषी को 40 साल बाद दोबारा जेल की सलाखों के पीछे जाने की नौबत आई तो उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट में अपील का फैसला आने में हुई देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी भी की। 71 साल के विजय को सुप्रीम कोर्ट से जमानत तो मिल गई है, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट का फैसला कब आएगा यह तो वक्त ही बताएगा।


महिला मित्र से गालीगलौज करने पर विजय ने 41 साल पहले वारदात की थी। उस वक्त उसकी उम्र 28 वर्ष थी। परेड में रहने वाला विजय सिंह महिला मित्र विद्या को अपने साथ घर पर रखता था। चार नवंबर 1983 की शाम लगभग पांच बजे विजय के भाई अजय ने फ्रिज खोलकर खाने-पीने का सामान निकाला, तो विद्या ने विरोध किया। इस पर अजय विद्या से गालीगलौज करने लगा।

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लाइसेंसी पिस्टल से कई फायर झोंककर की हत्या 
पड़ोस में रहने वाले अजय के भाई अशोक सिंह, भाभी इंदिरा व दोस्त सुबोध सक्सेना भी वहां पहुंच गए। तभी विजय सिंह दिवाली की खरीदारी कर घर लौटा तो विद्या ने अजय की शिकायत की जिस पर गुस्साए विजय ने अजय पर लाइसेंसी पिस्टल से कई फायर झोंककर हत्या कर दी थी। पुलिस ने विजय को गिरफ्तार कर उसके पास से पिस्टल बरामद कर ली थी।

तीनों ही गवाही के दौरान बयान से पलट गए थे
मृतक अजय के भाई अशोक ने बेकनगंज थाने में दूसरे भाई विजय के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन ने कोर्ट में 12 गवाह पेश किए थे, जबकि चार गवाह कोर्ट विटनेस के रूप में बुलाए गए थे। घटना में अशोक सिंह, इंदिरा और सुबोध सक्सेना को चश्मदीद गवाह माना गया था, लेकिन यह तीनों ही गवाही के दौरान कोर्ट में बयान से पलट गए थे।

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1985 में  दोषी मानकर उम्रकैद की सजा सुना दी थी
अन्य साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर कोर्ट ने दिसंबर 1985 में विजय को हत्या का दोषी मानकर उम्रकैद की सजा सुना दी थी। विजय ने हाईकोर्ट में अपील की थी,  जो नौ फरवरी 2026 को हाईकोर्ट ने खारिज की। इसके बाद दोषी ने सुप्रीम में अपील की थी। हाईकोर्ट में 43 वर्षों तक मामला लंबित रहने पर कोर्ट के रवैये पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई थी चिंता।

हाईकोर्ट में बचाव पक्ष के इन तर्कों का मिला था लाभ

  • रिपोर्ट दर्ज कराने वाले अशोक ने कहा था कि उसने रिपोर्ट में वही लिखा जो पुलिस ने कहा था। घटना के समय वह मौजूद नहीं था।
  • सुबोध ने भी विजय द्वारा अजय की हत्या करने की बात को नकार दिया था।
  • इंदिरा ने विद्या को विजय की महिला मित्र नहीं बल्कि अपनी नौकरानी बताया था। इंदिरा ने भी विजय के हत्या न करने और गोलियों की आवाज भी न सुनने की बात कही थी।
  • दो सिपाहियों ने पिकेट ड्यूटी में तैनाती की बात कही थी लेकिन जीडी में उनकी कोई एंट्री नहीं थी। वह घटनास्थल पर कैसे पहुुंचे इसका कोई ठोस सबूत नहीं मिल सका था।

  • बैलेस्टिक विशेषज्ञ ने गवाही के दौरान कहा था कि जो गोलियां उन्हें जांच के लिए मिलीं वह पिस्टल की नहीं थीं।
  • घटनास्थल से पांच खाली कारतूस बरामद किए गए थे। इसमें से दो कारतूस बरामद पिस्तौल से नहीं चलाए गए थे, जबकि तीन उसी पिस्टल के थे। घटना में दो असलहों का इस्तेमाल हुआ एक राइफल और एक पिस्टल।
  • खाली कारतूस और हथियार को जांच के लिए लगभग 11 सप्ताह बाद भेजा गया था। पिस्टल से उंगलियों के निशान भी सुरक्षित नहीं किए गए थे।

अभियोजन ने सजा बरकरार रखने पर दिया जोर
अभियोजन का तर्क था कि पारिवारिक मामला होने की वजह से भाई-भाभी बयान से मुकर गए हैं। घटनास्थल पर पहुंचे दोनों सिपाहियों ने विजय को पहचाना है। घटना के तुरंत बाद विजय की गिरफ्तारी और असलहे की बरामदगी हुई है।

सिपाहियों ने नियमों का पालन नहीं किया
घटना साफ है इसलिए ट्रायल कोर्ट ने विजय को सही सजा सुनाई है। हाईकोर्ट ने माना था कि समय बीतने के साथ अक्सर ऐसे गवाह जो परिवार के सदस्य होते हैं। भाग्य के आगे हार मानकर अदालत के सामने बयान से मुकर जाते हैं। कोर्ट ने माना कि भले ही सिपाहियों ने बिना लिखा-पढ़ी घटनास्थल पर पहुंचकर पुलिस नियमों का पालन नहीं किया।

बयानों की सत्यता को परख लेता है ट्रायल कोर्ट
लेकिन ट्रायल कोर्ट ने उनकी गवाही को विश्वसनीय माना है। हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलीय न्यायालय सिर्फ लिखित बयानों को ही पढ़ सकता है, जबकि ट्रायल कोर्ट गवाही के दौरान गवाह के हावभाव, शारीरिक भाषा और आवाज के लहजे से उसके बयानों की सत्यता को परख लेता है।

आत्मसमर्पण कर जेल जाने के निर्देश दिए थे
इसलिए ट्रायल कोर्ट गवाहों को बेहतर परीक्षण कर सकता है। ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई गलती न पाते हुए हाईकोर्ट ने विजय की अपील खारिज कर सजा को बरकरार रखा था। जमानत पर बाहर विजय को आत्मसमर्पण कर जेल जाने के निर्देश दिए थे।

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