UP: गवाह मरे और सुबूत खोए, मुख्य मुल्जिम बन गया गवाह, 34 साल बाद धुला ‘नकली दवा’ बेचने का कलंक, पढ़ें मामला
Kanpur News: कानपुर के जूही में 1992 में पकड़े गए नकली दवा कारखाने के मामले में 34 साल बाद कोर्ट ने आरोपी उमाशंकर को बरी कर दिया है। लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान ड्रग इंस्पेक्टर और गवाहों की मौत हो चुकी थी और कोर्ट में पुलिस जब्त उपकरण भी पेश नहीं कर सकी।
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विस्तार
कानपुर में जूही पुलिस व ड्रग इंस्पेक्टर ने छापा मारकर 34 साल पहले नकली दवा बनाने का कारखाना पकड़ने का दावा किया। वर्ष 1992 में रिपोर्ट दर्ज हुई। वर्ष 2009 में मुकदमा सेशन कोर्ट पहुंचा और 17 साल चली कानूनी प्रक्रिया के दौरान जहां एक अभियुक्त की मौत हो गई। वहीं ज्यादातर गवाहों का भी निधन हो चुका था।
सिर्फ दो गवाह ही कोर्ट में पेश किए जा सके और पर्याप्त सुबूत न होने के कारण अपर जिला जज 15 मुकेश कुमार सिंह ने आरोपी को बरी कर दिया। पुलिस टीम ने ड्रग इंस्पेक्टर के साथ 26 मार्च 1992 को एक मकान में छापा मारकर वहां छोटी जूही परमपुरवा निवासी उमाशंकर वाजपेई को दवा की बोतल सील करते पकड़ने का दावा किया था।
दोनों के खिलाफ दर्ज की थी रिपोर्ट
उमाशंकर ने उन्नाव में स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत शारदानगर निवासी लक्ष्मीनारायण कटियार को भागीदार बताया था, जिसके बाद पुलिस ने जूही थाने में उमाशंकर और लक्ष्मीनारायण के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की थी। बाद में लक्ष्मीनारायण की नामजदगी गलत पाते हुए विवेचना के बाद उमाशंकर वाजपेई और महेशचंद्र श्रीवास्तव के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी।
दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई हुई
महेशचंद्र की इस दौरान मौत हो गई। जूही थाने में 1992 में रिपोर्ट दर्ज कराने के साथ ही ड्रग इंस्पेक्टर द्वारा जनवरी 1993 में उमाशंकर के खिलाफ एक परिवाद भी कोर्ट में दाखिल कर दिया गया। जुलाई 2009 में मामला सेशन कोर्ट पहुंचा। दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई हुई।
संदेह का लाभ देते हुए उमाशंकर को बरी कर दिया
इस दौरान ड्रग इंस्पेक्टर के साथ ही ज्यादातर गवाहों की मौत हो चुकी थी, जो दो गवाह बचे थे वह पुलिस के ही थे। अभियोजन ने इन्हें ही अदालत में पेश किया, लेकिन यह गवाह भी अभियोजन की कहानी को कोर्ट में साबित नहीं कर सके। इस पर कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए उमाशंकर को बरी कर दिया।
इन कमियों का मिला लाभ
- ड्रग इंस्पेक्टर ने परिवाद में महेश को अभियुक्त न बनाकर गवाह बनाया था, जबकि एफआईआर से संबंधित चार्जशीट में महेश अभियुक्त था। एक ही मामले में महेश अभियुक्त और गवाह दोनों कैसे बना इसे स्पष्ट नहीं किया गया।
- जो सैंपल लिया गया था वह मानक के अनुरूप पाया गया।
- शीशी में दवा भरने के उपकरण जब्त करने की बात तो कही गई थी लेकिन उपकरण कोर्ट में पेश नहीं किए गए।