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Iran Israel War: विदेशी ऑर्डर रुके, कारीगरों की बढ़ीं मुश्किलें; हैंडीक्राफ्ट उद्योग पर दोहरी मार

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Mon, 30 Mar 2026 03:46 PM IST
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सार

Varanasi News: पश्चिमी एशिया में चल रहे युद्ध का असर पारंपरिक हैंडीक्राफ्ट उद्योग पर भी दिखने लगा है। नए ऑर्डर नहीं मिलने से कारीगरों को दिक्कतें हो रही हैं। अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने अपनी-अपनी समस्याएं बताईं।

Iran-Israel War Foreign orders halted artisans difficulties increased handicraft industry hit hard
पारंपरिक हैंडीक्राफ्ट उद्योग पर पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर। - फोटो : संवाद
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विस्तार

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब बनारस के पारंपरिक हैंडीक्राफ्ट उद्योग पर साफ तौर पर दिखने लगा है। शिपिंग मार्ग बाधित होने से विदेशी आयातकों ने बनारसी उत्पादों के ऑर्डर देने बंद कर दिए हैं। इससे न सिर्फ नए ऑर्डर रुक गए हैं, बल्कि पहले से तैयार माल का भुगतान भी अटक गया है। 

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रामनगर स्थित आदर्श सेवा समिति के सचिव आदर्श कुमार मौर्य बताते हैं कि उनके पिता द्वारिका प्रसाद पत्थर की नक्काशी के जाने-माने कलाकार हैं। अमेरिका और यूरोप के कई देशों में भेजे गए उत्पादों का भुगतान अभी तक नहीं मिला है। अमेरिका से ऑर्डर मिलने के बावजूद आवागमन की दिक्कतों के चलते उन्हें होल्ड कर दिया गया है।
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स्टोन क्राफ्ट से जुड़े रामनगर के राजेश यादव, लक्सा के संदीप मौर्य, महादेव मौर्य, दीना मौर्य, रवि वर्मा और बबलू वर्मा का कहना है कि युद्ध के कारण महंगाई बढ़ रही है और निर्यात लगभग ठप है। कश्मीरीगंज स्थित शिल्पांचल कुटीर उद्योग के संचालक अशोक कुमार सिंह बताते हैं कि उनकी संस्था में कैंडल स्टैंड, लैंप, अगरबत्ती स्टैंड, पेपर वेट और विभिन्न पशु-पक्षियों की आकृतियां तैयार की जाती हैं। ऑर्डर के मुताबिक माल तैयार है, लेकिन विदेशी खरीदारों ने उसे होल्ड कर दिया है।

उधर, करोमा गांव की विश्वकर्मा बस्ती में हर घर में लकड़ी की नक्काशी का काम होता है। प्रेम शंकर विश्वकर्मा, चंद्रप्रकाश विश्वकर्मा, ओमप्रकाश शर्मा, घनश्याम और गणेश प्रसाद जैसे कारीगर बताते हैं कि युद्ध शुरू होने के बाद से वुड कार्विंग उद्योग पर सीधा असर पड़ा है। 

कारीगर अमित कुमार विश्वकर्मा बताते हैं कि कैम लकड़ी से बुद्ध प्रतिमाएं, अशोक स्तंभ, पेन स्टैंड और अन्य सजावटी सामान बनाए जाते हैं जिनकी विदेशों में हमेशा मांग रहती थी लेकिन अब ऑर्डर रुक गए हैं। शिल्पी प्रेमशंकर विश्वकर्मा बताते हैं कि पहले कैम लकड़ी 300 रुपये प्रति वर्ग फीट मिल जाती थी जो अब बढ़कर 1500 से 2000 रुपये तक पहुंच गई है। विदेशी ऑर्डर बंद होने से कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। 

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