UP: 700 रुपये के स्क्रैप चोरी, अदालत का फैसला आने में लगे 22 साल; खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए लड़ी महिला
Varanasi News: वाराणसी की अदालतों में न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार सामने आई है। 20–26 साल पुराने मामलों में हाल में फैसले आए, जबकि 373 मामले 20 साल से लंबित हैं। 700 रुपये की चोरी, मारपीट और भ्रष्टाचार जैसे मामलों में भी इंसाफ पाने के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ा।
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UP News: अदालतों से हाल के दिनों में आए कुछ फैसलों ने न्यायिक प्रक्रिया की लंबी और जटिल राह की एक झलक पेश की है। मामूली विवाद और छोटे-छोटे मामलों में इंसाफ पाने के लिए बार-बार दौड़-भाग करनी पड़ी। 700 रुपये की रेलवे की संपत्ति (स्क्रैप) चोरी का मामला 22 साल तक चला। एक महिला को खुद को बेगुनाह साबित करने में पूरे 26 साल लग गए।
एक पीड़िता ने आरोपियों को सजा दिलाने के लिए 20 साल से ज्यादा समय तक अदालत में लड़ाई जारी रखी। आखिरकार तीन-तीन साल की सजा मिल सकी। इन मामलों में से कई फैसले पिछले 60 दिनों के भीतर आए हैं। 24 साल पुराना फौजदारी का मामला अब भी अदालत के विचाराधीन है।
अदालतों में 20 साल पुराने 373 मामले लंबित : दीवानी कचहरी में नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड से मिले आंकड़ों के अनुसार 20 साल पुराने 373 मामले अलग-अलग अदालतों में लंबित हैं। इनमें से कुछ की सुनवाई जारी है तो कुछ में आदेश सुरक्षित रखे गए हैं। ये मामले न सिर्फ न्याय मिलने में देरी की कहानी बयां करते हैं बल्कि यह भी बताते हैं कि कई बार इंसाफ की राह कितनी लंबी और धैर्य भरी होती है।
केस 1: नहवानीपुर थाना कपसेठी निवासी चिंता देवी ने वर्ष 2004 में थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। आरोप था कि गांव के ही रहने वाले विपक्षीगण उनके खेत में जबरन घुसकर सरसों की फसल उखाड़ रहे थे। विरोध करने पर आरोपियों ने उनके साथ मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी। इस मामले में उन्होंने आरोपियों को सजा दिलाने के लिए धैर्य का परिचय देते हुए कोर्ट में 22 साल तक लंबी लड़ाई लड़ी। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर तीनों आरोपियों को दोषी मानते हुए उन्हें तीन-तीन साल की सजा सुनाई। जुर्माना भी लगाया।
केस 2: 22 साल पहले रेलवे की संपत्ति की चोरी का मामला सामने आया था। इसमें रेलवे के खलासी रामचंद्र प्रसाद समेत दो लोगों को अभियुक्त बनाया गया। एक आरोपी ने वर्ष 2008 में अपना जुर्म स्वीकार कर मुकदमा समाप्त करा लिया था जबकि रामचंद्र का मामला चलता रहा। दोनों पर आरोप था कि एक बोरी में ढलवा चौकी, दूसरी बोरी में तीन सिग्नल रॉड के टुकड़े और रेल लाइन में लगने वाली नौ चाबियां चोरी की गई थीं। उस समय चोरी गए सामान की कीमत 700 रुपये थी। 22 साल तक चले इस मामले में अदालत ने रामचंद्र प्रसाद को एक साल की परिवीक्षा पर रिहा किया। इस मुकदमे में अभियोजन की ओर से सात गवाह पेश किए गए थे।
केस 4: विद्यालय में बच्चों की उपस्थिति संबंधी जांच रिपोर्ट के एवज में रिश्वत लेने के आरोप में घिरी तत्कालीन जिला विकलांग कल्याण अधिकारी मनोरमा देवी को साक्ष्य के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए अदालत ने बरी कर दिया। इस मामले में सह-आरोपी उपनिदेशक विकलांग कल्याण एनएन नाथ वर्मा की पहले ही मृत्यु हो चुकी है। खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए मनोरमा देवी ने 26 साल तक अदालत में लड़ाई लड़ी। आरोप था कि 18 फरवरी 2000 को तत्कालीन जिला विकलांग कल्याण अधिकारी मनोरमा देवी और उपनिदेशक एनएन नाथ वर्मा विद्यालय पहुंचे और जांच रिपोर्ट के पक्ष में भेजने के लिए 10 हजार रुपये व दो बनारसी साड़ियां मांगी थीं। सतर्कता अधिष्ठान, वाराणसी सेक्टर ने इस मामले में मुकदमा दर्ज किया था।
24 साल से नदेसर शूटआउट में फैसले का इंतजार
फैजदारी मामले में नदेसर शूटआउट प्रकरण सबसे पुराने मामलों में एक है। साल 2002 पुराने इस गोलीकांड हुए 24 साल पूरे हो गए है। इस मामले में दोनों पक्ष पूर्व सांसद धनंजय सिंह और अयोध्या की एक सीट से विधायक अभय सिंह को कोर्ट के फैसले का इंतजार है। दोनों पक्ष की ओर से अदालत में जिरह बहस अंतिम दौर में है जबकि साल 2004 में लखनऊ कैंट में बृजेश सिंह और मुख्तार अंसारी गोलीकांड में लखनऊ कोर्ट ने फैसला सुना दिया है।