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आम की खेती: इस बार आम की पैदावार खूब, बाैर पर छिड़काव न करें किसान; जान लें कृषि वैज्ञानिकों की सलाह

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Wed, 11 Mar 2026 11:59 AM IST
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सार

Varanasi News: पूर्वांचल में खेती और बागबानी के फसलों को लेकर कृषि विज्ञानियों ने खास जानकारी दी है। उन्होंने कहा कि 75  प्रतिशत गेहूं की फसल देरी से बोई गई है, इसका असर उत्पादन पर होगा। इस बार सरसों की खेती भी अच्छी हुई है।

mango yields are plentiful farmers should avoid spraying on blossoms advice of agricultural scientists
वाराणसी में आम के पेड़ पर लगे बाैर। - फोटो : संवाद
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विस्तार

Varanasi News: पूर्वांचल में इस बार रबी और बागबानी फसलों पर मौसम का मिला-जुला असर देखने को मिल रहा है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार बढ़ते तापमान के कारण देर से बोए गेहूं की पैदावार प्रभावित हो सकती है, जबकि समय पर बोई सरसों बेहतर उत्पादन दे रही है। वहीं, आम के बागों में अच्छी मात्रा में बौर आने से इस साल अच्छी पैदावार की उम्मीद जताई जा रही है। 

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इस साल आम की पैदावार के अच्छे संकेत, फूल आने से बागवानों में उम्मीद
कृषि वैज्ञानिक डॉ. कल्याण बर्मन ने बताया कि पूर्वांचल में इस बार आम की अच्छी पैदावार होने की उम्मीद है। इस समय बागों में अच्छी मात्रा में बौर (फूल) आए हैं। आम की पैदावार सामान्यत: एक साल कम और एक साल अधिक होती है। इस साल पेड़ों पर फूल अच्छी मात्रा में आए हैं, जिससे पैदावार बेहतर रहने की संभावना है। उन्होंने बागवानों को सलाह दी कि इस समय आम के पेड़ों पर किसी भी प्रकार के कीटनाशक का छिड़काव न करें। 

इस दौरान मधुमक्खियां और अन्य कीट फूलों पर बैठकर परागण की प्रक्रिया को पूरा करते हैं। यदि इस समय दवाओं का छिड़काव किया गया तो इससे परागण प्रभावित हो सकता है और उत्पादन पर असर पड़ सकता है। जब आम के छोटे फल दिखाई देने लगते हैं तो उनमें से लगभग 0.8 फीसदी फल गिरना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। 

इससे किसानों को घबराने की जरूरत नहीं है। हालांकि इसके बाद भी यदि अधिक मात्रा में फल गिर रहे हों तो नेफ्थिल एसिटिक एसिड का छिड़काव किया जा सकता है। इससे फलों के गिरने की समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है। 

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समय पर बोई सरसों दे रही बेहतर पैदावार, देर से बोआई से नुकसान 
कृषि वैज्ञानिक प्रो. कार्तिकेय श्रीवास्तव ने कहा कि पूर्वांचल में इस बार सरसों की फसल का प्रदर्शन काफी हद तक बोआई के समय पर निर्भर करेगा। समय पर बोआई करने वाले किसानों को बेहतर उत्पादन मिलने की उम्मीद है, जबकि देर से बोआई वाली फसल प्रभावित हो सकती है। जिन किसानों ने धान की कटाई के बाद दिसंबर में सरसों की बोआई की है, उनकी फसल में दाने हल्के रहने की संभावना है। इसके विपरीत नवंबर में बोआई करने वाले किसानों के लिए इस बार सरसों की पैदावार अच्छी रहने की उम्मीद है। 

उन्होंने बताया कि इस बार मौसम सरसों की फसल के लिए अनुकूल रहा। पूरे सीजन में बारिश और घने धुंध की स्थिति नहीं बनी, जिससे फसल को पर्याप्त धूप मिली। साथ ही मधुमक्खियों का आगमन भी पर्याप्त हुआ, जिससे परागण बेहतर रहा और रोग की आशंका भी कम हुई। प्रो. श्रीवास्तव के अनुसार पूर्वांचल में 5 नवंबर से पहले सरसों की बुआई करने वाले किसानों को 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन मिल रहा है। वहीं दिसंबर के बाद बोआई करने वालों को अच्छी खेती होने पर लगभग 16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और खराब स्थिति में करीब 14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन मिल सकता है। 

पूर्वांचल में 75 फीसदी फसल देरी से बोई गई, दाने पतले होने की आशंका
कृषि वैज्ञानिक प्रो. विनोद कुमार मिश्र ने कहा कि पूर्वांचल में इस बार गेहूं की पैदावार पर मौसम की मार पड़ने की आशंका है। देर से बोआई और बढ़ते तापमान के कारण फसल प्रभावित हो सकती है।  इस बार पूर्वांचल में करीब 75 फीसदी गेहूं की बोआई देरी से हुई थी। इसी वजह से फसल का विकास सामान्य समय के मुकाबले पीछे चल रहा है। इस समय रात का तापमान करीब 20 डिग्री और दिन का तापमान 30 डिग्री तक पहुंच रहा है। इसके कारण औसत तापमान करीब 17 डिग्री तक पहुंचने लगा है, जो गेहूं की फसल के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। 

कई खेतों में अभी गेहूं पूरी तरह तैयार नहीं हो पाया है। यदि लगातार 17 डिग्री के आसपास तापमान बना रहता है तो गेहूं की पैदावार पर असर पड़ सकता है। इससे दाने पतले हो जाएंगे और उत्पादन में गिरावट आने की आशंका है। प्रो. विनोद कुमार मिश्र ने किसानों को सलाह दी है कि खेतों में स्प्रिंकलर का उपयोग शुरू कर दें। स्प्रिंकलर से सिंचाई करने पर खेत का तापमान कुछ हद तक कम किया जा सकता है। 

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