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महाकुंभ: काशी पहुंचने लगे नागा साधु..., गंगा किनारे साधना में हुए लीन; महाशिवरात्रि तक करेंगे अमृत स्नान

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Thu, 06 Feb 2025 09:31 PM IST
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सार

काशी में नागा साधुओं का आगमन शुरू हो गया है। अखाड़ा से जुड़े लोग उनका स्वागत-सत्कार भी करने लगे हैं। गंगा किनारे शिविर लगाकर वे जप-तप में लीन हो गए हैं।

naga sadhu reached in kashi from mahakumbh meditation on banks of Ganga Amrit bath till Mahashivratri
काशी के घाटों पर जुटने लगे नागा साधु। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

महाकुंभ से अब काशी में नागा साधुओं का जुटान होने लगा है। सनातन परंपरा के तेरह अखाड़ों में करीब छह अखाड़े के संन्यासियों का भी काशी आगमन शुरू हो गया है। यहां गंगा किनारे मिनी कुंभ की झलक दिखने लगी है। गंगा के प्रमुख घाटों पर टेंट लग रहे हैं। कुछ बंनकर तैयार हो गए हैं। सात्विक भोजन बनाकर नागा साधु अपनी भक्ति में लीन हैं।



महाकुंभ में अब तक तीन अमृत स्नान पूरे हो गए हैं जिनमें मकर संक्रांति, माैनी अमावस्या और वसंत पंचमी थे। प्रयागनगरी के त्रिवेणी तट से साधु-संन्यासियों के शिविर खुलने शुरू हो गए हैं, अब उनका समूह काशी की ओर अग्रसर हो चला है। विभिन्न अखाड़ों और संप्रदाय के नागा साधु गंगा की रेती पर भी अपने टेंट बनाते हैं।
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नागा साधुओं के दर्शन-पूजन के लिए दक्षिण और आसपास के भक्त भी आने लगे हैं। घाटों पर सैर-सपाटा करने वाले पर्यटक भी इनका आशीर्वाद ले रहे हैं। शरीर में भभूत लगाकर साधना में लीन नागा साधुओं से विदेशी पर्यटक भी काफी आकर्षित होते हैं। इनके साथ शिविर में समय भी व्यतीत करते हैं।

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चार पीठ और तेरह अखाड़े
आदि शंकराचार्य द्वारा धर्म रक्षा के लिए चार पीठों की स्थापना की थी। वे चारों स्थान ज्योतिष्पीठ बद्रिकाश्रम (विद्यामठ), श्रृंगेरी पीठ (लहुराबीर), द्वारिका शारदा पीठ (विद्यामठ) और पुरी गोवर्धन (अस्सी) पीठ हैं। 13 अखाड़ों में नागा साधुओं के सबसे बड़े अखाड़ों में शामिल श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़ा सहित चार प्रमुख शैव संन्यासी अखाड़ों का मुख्यालय धर्म और संस्कृति की नगरी काशी में ही है।

इनमें हनुमान घाट पर श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़ा, दशाश्वमेध घाट पर श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा, हनुमान चाैक कपिलधारा में श्री पंच अटल अखाड़ा, शिवाला घाट पर महानिरंजनी अखाड़ा के मुख्यालय हैं।

इनके अतिरिक्त राजघाट पर श्रीअग्नि अखाड़ा, कपिलधारा पर आनंद अखाड़ा, पद्मश्री सिनेमा के पास कुरुक्षेत्र पोखरा पर वैष्णव संप्रदाय के बड़ा उदासीन अखाड़ा, निर्मल अखाड़ा निर्मोही अखाड़ा, अनी अखाड़ा आदि सभी 13 अखाड़ों की शाखाएं हैं। 

काशी यानी साधु-संन्यासियों की भी नगरी
काशी साधु-संन्यासियों की भी नगरी है। सनातन धर्म के चारों पीठ और 13 अखाड़ों के हजारों संन्यासियों का गुजर-बसर इनके मठों और धर्मशालाओं में होता है। गंगा किनारे बने टेंट में नेपाल से भी संन्यासियों का जुटा हुआ है। रामकीन बाबा ने बताया किया काशी और यहां के लोग काफी अच्छे हैं। काशी के बारे जितना जुना था, उससे भी आकर्षक नगरी है।

वहीं, स्वामी पद्म गिरी ने कहा कि यहां हम लोग जप-तप कर रहे हैं। काफी शांति मिल रही हैं। यात्रा भी काफी सुगम और सहज थी। काफी सम्मान के साथ हमें नेपाल से प्रयागराज उसके बाद काशी पहुंचाया गया। काशी में आए हैं तो बाबा विश्वनाथ का दर्शन मेरे लिए अतिआवश्यक है।

एक सवाल के जवाब में कहा कि प्रयाग की तरह यहां भी गंगा स्वच्छ हैं। बताया कि जप-तप के साथ हम लोग सभी घाटों का भी भ्रमण कर रहे हैं, ये हमारे लिए अच्छा अनुभव है।

समाज के 13 प्रमुख अखाड़ों का विवरण इस प्रकार है

  1. निरंजनी अखाड़ा- यह अखाड़ा 826 ईस्वी में गुजरात के मांडवी में स्थापित हुआ माना जाता है। इनके ईष्ट देव भगवान शंकर के पुत्र कार्तिकस्वामी हैं। इनमें दिगम्बर, साधु, महन्त व महामंडलेश्वर होते हैं। इनकी शाखाएं इलाहाबाद, उज्जैन, हरिद्वार, र्त्यंबकेश्वर व उदयपुर में हैं।
  2. जूना अखाड़ा- ऐसी मान्यता है कि यह अखाड़ा 1145 में उत्तराखण्ड के कर्णप्रयाग में स्थापित हुआ। इसे भैरव अखाड़ा भी कहते हैं। इनके ईष्ट देव रुद्रावतार दत्तात्रेय हैं। इसका केंद्र वाराणसी के हनुमान घाट पर माना जाता है। हरिद्वार में मायादेवी मंदिर के पास इनका आश्रम है। इस अखाड़े के नागा साधु माने जाते हैं और वर्तमान में साधू समाज का यही सबसे बड़ा अखाड़ा माना जाता है।
  3. महानिर्वाण अखाड़ा- यह अखाड़ा 681 ईस्वी में स्थापित हुआ माना जाता है। कुछ लोगों का मत है कि इसकी स्थापना बिहार-झारखण्ड के बैजनाथ धाम में हुआ था, जबकि कुछ इसका जन्म स्थान हरिद्वार में नील धारा के पास मानते हैं। इनके ईष्ट देव कपिल महामुनि हैं। इनकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन, र्त्यंबकेश्वर, ओंकारेश्वर और कनखल में हैं।
  4. अटल अखाड़ा- यह अखाड़ा 569 ईस्वी में गोंडवाना क्षेत्र में स्थापित किया गया बताया जाता है। इनके ईष्ट देव भगवान गणेश हैं। यह सबसे प्राचीन अखाड़ों में से एक माना जाता है। इसकी मुख्य पीठ पाटन में है लेकिन आश्रम कनखल, हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन व र्त्यंबकेश्वर में भी हैं।
  5. आह्वान अखाड़ा- माना जाता है कि यह अखाड़ा 646 में स्थापित हुआ और 1603 में पुनर्संयोजित किया गया। इनके ईष्ट देव श्री दत्तात्रेय और श्री गजानन हैं। इस अखाड़े का केंद्र स्थान काशी है। इसका आश्रम ऋषिकेश में भी है।
  6. आनंद अखाड़ा- इस अखाड़े की स्थापना 855 ईस्वी में मध्यप्रदेश के बेरार में मानी जाती है। इसका केंद्र वाराणसी में है। इसकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन में भी हैं।
  7. पंचाग्नि अखाड़ा- ऐसी मान्यता है कि इस अखाड़े की स्थापना 1136 में हुई थी। इनकी इष्ट देव गायत्री हैं और इनका प्रधान केंद्र काशी है। इनके सदस्यों में चारों पीठ के शंकराचार्य, ब्रहमचारी, साधु व महामंडलेश्वर शामिल हैं। परंपरानुसार इनकी शाखाएं इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन व र्त्यंबकेश्वर में हैं।
  8. नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा- गोरखपंथियों के अनुसार यह अखाड़ा ईस्वी 866 में अहिल्या-गोदावरी संगम पर स्थापित हुआ। इनके संस्थापक पीर शिवनाथजी हैं। इनका मुख्य दैवत गोरखनाथ है और इनमें बारह पंथ हैं। यह संप्रदाय योगिनी कौल नाम से प्रसिद्ध है और इनकी र्त्यंबकेश्वर शाखा र्त्यंबकंमठिका नाम से प्रसिद्ध है।
  9. वैष्णव अखाड़ा- यह बालानंद गैर शैव अखाड़ा ईस्वी 1595 में दारागंज में श्री मध्यमुरारी में स्थापित हुआ। समय के साथ इनमें निर्मोही, निर्वाणी, खाकी आदि तीन संप्रदाय बने। इनका अखाड़ा र्त्यंबकेश्वर में मारुति मंदिर के पास था। 1848 तक शाही स्नान र्त्यंबकेश्वर में ही हुआ करता था। परंतु 1848 में शैव व वैष्णव साधुओं में पहले स्नान कौन करे इस मुद्दे पर झगड़े हुए। श्रीमंत पेशवाजी ने यह झगड़ा मिटाया। उस समय उन्होंने र्त्यंबकेश्वर के नजदीक चक्रतीर्था पर स्नान किया।
  10. उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा- इस संप्रदाय के संस्थापक श्री चंद्रआचार्य उदासीन हैं। इनमें सांप्रदायिक भेद हैं। इनमें उदासीन साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं शाखा प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, र्त्यंबकेश्वर, भदैनी, कनखल, साहेबगंज, मुलतान, नेपाल व मद्रास में है।
  11. उदासीन नया अखाड़ा- इसे बड़ा उदासीन अखाड़ा के कुछ सांधुओं ने विभक्त होकर स्थापित किया। इनके प्रवर्तक मंहत सुधीरदासजी थे। इनकी शाखाएं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, र्त्यंबकेश्वर में हैं।
  12. निर्मल पंचायती अखाड़ा- यह अखाड़ा 1784 में  अपनी स्थापना मानता है। सन् 1784 में हरिद्वार कुंभ मेले के समय एक बड़ी सभा में विचार विनिमय करके श्री दुर्गासिंह महाराज ने इसकी स्थापना की। इनकी ईष्ट पुस्तक श्री गुरुग्रन्थ साहिब है। इनमें सांप्रदायिक साधु, मंहत व महामंडलेश्वरों की संख्या बहुत है। इनकी शाखाएं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और र्त्यंबकेश्वर में हैं।
  13. निर्मोही अखाड़ा- निर्मोही अखाड़े की स्थापना 1720 में रामानंदाचार्य ने की थी। इस अखाड़े के मठ और मंदिर उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और बिहार में हैं। पुराने समय में इसके अनुयायियों को तीरंदाजी और तलवारबाजी की शिक्षा भी दिलाई जाती थी।
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