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Questions Raised Over Arbitrary Practices of Private Schools in Hisar; Fees, Books, and Uniforms Become Major Concerns for Parents
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हिसार में निजी स्कूलों की मनमानी पर उठा सवाल; फीस, किताबें और यूनिफॉर्म बनी अभिभावकों की बड़ी चिंता
शिक्षा, जो समाज की नींव मानी जाती है, आज कई जगहों पर व्यापार का रूप लेती नजर आ रही है। बच्चों के बेहतर भविष्य की चाह में अभिभावक बेहतर शिक्षा दिलाना चाहते हैं। निजी स्कूल अभिभावकों की इसी कमजोरी का फायदा उठाकर उनसे महंगी फीस वसूलते हैं। महंगी किताबें, महंगी ड्रेस खरीदने को मजबूर करते हैं। अमर उजाला कार्यालय में शुक्रवार को आयोजित संवाद कार्यक्रम में शिक्षकों, अभिभावकों ,समाजिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों ने निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली पर अपने विचार साझा किए। सभी ने सरकार से ऐसी मनमानी पर कुछ सख्त नियम बनाने की मांग की।फीस बढ़ोतरी, पुस्तकें, ड्रेस के रेट तय होने चाहिएं।
निजी स्कूल हर साल बिना ठोस कारण किताबों के नए एडिशन लागू कर देते हैं, जिससे पुरानी किताबें बेकार हो जाती हैं और अभिभावकों पर अतिरिक्त खर्च का दबाव बढ़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि कई स्कूल यूनिफॉर्म और अन्य सामग्री के लिए तय दुकानों से ही खरीदने का दबाव बनाते हैं, जहां गुणवत्ता भी संतोषजनक नहीं होती। -पूनम नागपाल, शिक्षिका।
इस समस्या के लिए अभिभावकों को भी आंशिक रूप से जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना था कि आज कई माता-पिता निजी स्कूलों को स्टेटस सिंबल के रूप में देखते हैं और बेहतर शिक्षा के नाम पर अधिक खर्च करने को तैयार रहते हैं। इसी मानसिकता का फायदा स्कूल प्रबंधन उठाते हैं।- ममता चंद्राकर, शिक्षिका
सरकार ने फीस बढ़ोतरी को लेकर कुछ नियम बनाए हैं, लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा। कई निजी स्कूल निर्धारित सीमा से अधिक फीस बढ़ा रहे हैं, क्योंकि निगरानी का अभाव है। उन्होंने कहा कि केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करना भी जरूरी है। -कमलेश भाटिया
जब पढ़ाई का आधार एनसीआरटी की किताबें हैं, तो निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें खरीदने का दबाव क्यों बनाया जाता है। अभिभावकों को निर्धारित दुकानों से समान खरीदने के लिए कहा जाता है। सरकार से इस पर रोक लगाने चाहिए।- राजबीर सिंह, शिक्षक
यूनिफॉर्म और किताबें स्कूल के अनुसार होना ठीक है, लेकिन अभिभावकों को उन्हें कहीं से भी खरीदने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। साथ ही फीस निर्धारण बच्चों की जरूरत और सुविधाओं के अनुसार होना चाहिए। वहीं, कई अभिभावकों ने कहा कि निजी स्कूलों में हर महीने अलग-अलग नामों से शुल्क लिया जाता है, जिससे मध्यम और गरीब वर्ग के परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। -ऊषा ठकराल, रिटायर्ड प्रिंसीपल
आज के समय में प्राइवेट स्कूल बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा कमाई का जरिया बन गए हैं। हर महीने फीस के अलावा अलग-अलग नामों से पैसे लिए जाते हैं, जिससे गरीब आदमी टूट जाता है। सरकार स्कूलों में अच्छी सुविधा दे रही है, फिर भी समाज के डर से लोग प्राइवेट स्कूल चुनते हैं। हमें सोच बदलनी होगी और बच्चों के भविष्य के साथ आर्थिक संतुलन भी जरूरी है। -मनीष, अभिभावक
सरकारी स्कूलों में आज सुविधाएं पहले से काफी बेहतर हो चुकी हैं स्मार्ट क्लास, मिड-डे मील, और योग्य शिक्षक उपलब्ध हैं। लेकिन अभिभावकों का भरोसा अभी भी कम है। प्राइवेट स्कूल जरूरत से ज्यादा किताबें और फीस थोपते हैं, जिससे बच्चों पर बोझ बढ़ता है। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान होना चाहिए, न कि दिखावा। अभिभावकों को जागरूक होकर सही विकल्प चुनना चाहिए। साथ ही सरकारी स्कूलों की छवि सुधारने के लिए समाज को भी आगे आना होगा ताकि हर बच्चा समान अवसर पा सके। -विनोद, शिक्षक
गरीब के लिए प्राइवेट स्कूल में बच्चे को पढ़ाना बहुत मुश्किल है। फीस भरने के लिए कई बार उधार लेना पड़ता है। सरकार स्कूलों में पढ़ाई और सुविधाएं अच्छी हैं, लेकिन समाज में प्राइवेट स्कूल को ही बेहतर माना जाता है। अगर सरकारी स्कूलों पर भरोसा बढ़े और खर्च कम हो, तो हम भी अपने बच्चों को बिना बोझ के पढ़ा सकते हैं। हम अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजना चाहते हैं क्योंकि वहां फीस का बोझ नहीं है और सुविधाएं भी मिल रही हैं। असली समस्या यह है कि शिक्षकों को पढ़ाने से ज्यादा अन्य सरकारी कार्यों में लगा दिया जाता है कभी जनगणना, कभी चुनाव तो कभी दूसरे काम में लगा दिया जाता है। -प्रशांत, समाजिक कार्यकर्ता
आज शिक्षा एक बड़ा व्यवसाय बन चुकी है। प्राइवेट स्कूल एडमिशन से लेकर हर छोटी सुविधा के लिए मोटी रकम वसूलते हैं जिससे आम आदमी परेशान है। कई बार नियम होने के बावजूद उनका पालन नहीं होता। सरकारी स्कूलों में सुधार हुआ है लेकिन प्रचार की कमी है। जरूरत है पारदर्शिता और सख्त निगरानी की ताकि शिक्षा व्यवस्था संतुलित और न्यायपूर्ण बन सके। सरकार की योजनाएं अच्छी हैं, लेकिन जब तक सही मार्गदर्शन और अवसर नहीं मिलेगा, तब तक इन बच्चों का भविष्य दबता ही रहेगा। -सौरभ,सामाजिक कार्यकर्ता
2009 में केंद्र सरकार ने राइट टू एजुकेशन कानून लागू किया था। जिसके हिसाब से हर 6 से 14 साल तक के बच्चे को निशुल्क शिक्षा का अधिकार दिया गया है। उसे यह शिक्षा उसके घर के नजदीक वाले स्कूल में देने का प्रावधान किया गया है। इस कानून के तहत बच्चे को शिक्षा के साथ निशुल्क पुस्तकें दिए जाने का अधिकार है। -गौरव नैन, अधिवक्ता
सारी गड़बड़ी ही सरकार की ओर से की जा रही है। एक साजिश के तहत निजी स्कूलों को बंद किया जा रहा है। शिक्षा को महंगा कर आम आदमी से दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। निजी स्कूलों को फीस ,ड्रेस ,स्टेशनरी हर एक काम की मनमानी छूट दी हुई है। बार बार शिकायतों के बाद भी अधिकारी कार्रवाई नहीं करते। -उदय चे, सामाजिक कार्यकर्ता।
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