क्या लद्दाख में पर्यावरण की आड़ लेकर कोई और खेल खेला जा रहा था? क्या आंदोलन और जनहित के नाम पर करोड़ों रुपये का विदेशी फंड निजी हितों के लिए इस्तेमाल हुआ? देश की जांच एजेंसियां अब इसी सवाल के जवाब तलाश रही हैं, और ताजा खुलासे सीधे-सीधे सोनम वांगचुक को घेरे में खड़ा कर रहे हैं।
सोनम वांगचुक की संस्था हिमालयन इंस्टीट्यूट्स ऑफ अल्टरनेटिव्स (एचआईएएल) पर गंभीर आरोप लगे हैं। दस्तावेज बताते हैं कि 2023-24 में इस एनजीओ को करीब 6 करोड़ रुपये का चंदा मिला था, जो अगले ही साल 15 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया। यानी दान अचानक दोगुना हो गया।
जांच में सामने आया कि संस्था के पास सात बैंक खाते थे, लेकिन इनमें से चार को सार्वजनिक नहीं किया गया। यही नहीं, एचआईएएल ने बिना एफसीआरए पंजीकरण कराए ही डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक का विदेशी चंदा लिया, जो कानून का सीधा उल्लंघन है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि एनजीओ का पैसा कहां गया? जांच एजेंसियों का दावा है कि करीब 6.5 करोड़ रुपये सीधे शेश्योन इनोवेशन्स प्रा. लि. नामक कंपनी के खाते में भेजे गए। इस कंपनी में खुद सोनम वांगचुक और गीतांजलि जेबी डायरेक्टर हैं।
2023-24 में कंपनी का लाभ 6.13% था, लेकिन 2024-25 में कारोबार बढ़कर लगभग 10 करोड़ रुपये पहुंच गया, जबकि मुनाफा घटकर केवल 1.14% रह गया। यह गिरावट जांच एजेंसियों के लिए शक पैदा कर रही है कि कहीं लाभ दबाने और पैसों को दूसरी जगह खपाने का खेल तो नहीं हुआ।
कंपनी के तीन खातों में से दो खातों की जानकारी छिपाई गई। इन्हीं खातों में एनजीओ से ट्रांसफर हुए करोड़ों रुपये पहुंचे थे।
वांगचुक की पुरानी संस्था स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चर मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) के नाम पर नौ बैंक खाते मिले, जिनमें से छह का जिक्र आधिकारिक कागजों में नहीं था। यानी यहां भी वित्तीय गतिविधियों में परदेदारी बरती गई।
सोनम वांगचुक सार्वजनिक मंचों पर कॉरपोरेट्स और बड़े उद्योगपतियों के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं। लेकिन दस्तावेज बताते हैं कि उनकी संस्थाओं ने उन्हीं कॉरपोरेट कंपनियों और सरकारी पीएसयू से भारी-भरकम कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड लिया। यानी सामने विरोध और पीछे से चुपचाप अनुदान स्वीकारने का खेल।
जांच एजेंसियों ने जब वांगचुक के निजी खातों की पड़ताल की तो और भी चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। उनके पास कुल नौ व्यक्तिगत खाते हैं, जिनमें से आठ को छिपाया गया।
2018 से 2024 के बीच इन खातों में 1.68 करोड़ रुपये की विदेशी रकम आई। यही नहीं, 2021 से मार्च 2024 तक वांगचुक ने अपने निजी खातों से 2.3 करोड़ रुपये विदेश भेजे। यह रकम किन संस्थाओं या व्यक्तियों को गई, इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं है। इससे हवाला जैसी आशंकाएं और गहरी हो गई हैं।
एफसीआरए की धारा 11 और 17 का उल्लंघन साफ दिख रहा है। साथ ही कंपनी अधिनियम की शर्तें और भारतीय दंड संहिता की धारा 467 (फर्जी दस्तावेज) और धोखाधड़ी से जुड़े अपराध भी इस मामले में जुड़े हैं। यही वजह है कि केंद्र सरकार ने कड़ा कदम उठाते हुए वांगचुक के एनजीओ का एफसीआरए लाइसेंस रद्द कर दिया।
अब उनकी संस्थाएं विदेश से किसी भी तरह का फंड नहीं ले पाएंगी। कानूनी जानकार मानते हैं कि आने वाले दिनों में इस मामले में सीबीआई और ईडी का शिकंजा और कस सकता है।
लद्दाख में लंबे समय से आंदोलनकारी छवि बनाने वाले सोनम वांगचुक अब सवालों के घेरे में हैं। एक तरफ वे खुद को पर्यावरण और शिक्षा के संरक्षक के रूप में पेश करते रहे, वहीं दूसरी तरफ विदेशी फंडिंग और निजी खातों में करोड़ों के लेन-देन के खुलासे उनकी नीयत पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
सरकार और एजेंसियों का मानना है कि इन पैसों का इस्तेमाल न केवल निजी लाभ बल्कि क्षेत्रीय हालात को बिगाड़ने की साजिश में भी हो सकता है।
अब देखना होगा कि जांच एजेंसियां इस मामले को कहां तक ले जाती हैं और क्या सोनम वांगचुक अपने खिलाफ लगे आरोपों से खुद को बरी करा पाएंगे या नहीं।
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