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Without naming names, Jaishankar targeted the policies of America and Trump.
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बिना नाम लिए अमेरिका और ट्रंप की नीतियों पर जयशंकर ने साधा निशाना
अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Published by: आदर्श Updated Fri, 26 Sep 2025 11:22 AM IST
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दुनिया आज जिस अस्थिर दौर से गुजर रही है, उसमें हर मंच पर सवाल उठते हैं क्या वैश्विक शक्तियां वाकई शांति और विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं, या फिर अपने हितों के हिसाब से नियम गढ़ती और बदलती रहती हैं? इसी पृष्ठभूमि में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने दक्षिण अफ्रीका की अध्यक्षता में आयोजित जी-20 विदेश मंत्रियों की बैठक में एक ऐसा बयान दिया जिसने सबका ध्यान खींचा। बिना किसी देश का नाम लिए उन्होंने दोहरे मानदंडों पर करारा हमला बोला और स्पष्ट किया कि वैश्विक संघर्षों से निपटने का रवैया न्यायपूर्ण और संतुलित होना चाहिए।
जयशंकर ने कहा, “कुछ देश वैश्विक संघर्षों के प्रति जिस तरह का रवैया अपनाते हैं, उसमें दोहरे मानदंड साफ नजर आते हैं।” उन्होंने इशारों-इशारों में यह स्पष्ट कर दिया कि कुछ शक्तियां शांति और स्थिरता की बातें तो करती हैं, लेकिन उनकी नीतियां ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा को और अधिक अनिश्चित बना देती हैं।
उनका कहना था कि पहले से ही नाजुक वैश्विक अर्थव्यवस्था में ऊर्जा जैसी जरूरी चीजों को अस्थिर करना किसी के लिए लाभकारी नहीं है, बल्कि यह केवल मतभेदों को और गहरा करता है।
विदेश मंत्री ने अपने भाषण का केंद्र शांति और विकास के बीच संबंध पर रखा। उन्होंने कहा कि शांति से ही विकास संभव है, लेकिन यदि विकास को खतरे में डाल दिया जाए, तो शांति का मार्ग कभी नहीं खुल सकता।
जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि संघर्षों का हल केवल संवाद और कूटनीति से ही निकल सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि दुनिया को यह समझना होगा कि आतंकवाद विकास के लिए सबसे बड़ा व्यवधान है और इसके प्रति न तो सहिष्णुता दिखानी चाहिए और न ही कोई रियायत देनी चाहिए।
यूक्रेन और गाजा युद्ध का जिक्र करते हुए जयशंकर ने कहा कि इन संघर्षों का सबसे बड़ा बोझ ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों पर पड़ा है।
• ऊर्जा, खाद्य और उर्वरक सुरक्षा बुरी तरह प्रभावित हुई।
• आपूर्ति श्रृंखला और लॉजिस्टिक्स बाधित हुए।
• लागत इतनी बढ़ गई कि गरीब और मध्यम आय वाले देशों के लिए दबाव असहनीय हो गया।
जयशंकर ने दोहराया कि विकास को बाधित करना शांति की गारंटी नहीं हो सकता।
विदेश मंत्री ने साफ कहा कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय स्थिति राजनीतिक और आर्थिक, दोनों स्तरों पर अस्थिर है। ऐसे में जी-20 सदस्य देशों की विशेष जिम्मेदारी है कि वे स्थिरता और संतुलन की दिशा में ठोस कदम उठाएं।
इसके लिए उन्होंने तीन उपाय सुझाए:
1. संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता देना।
2. आतंकवाद के खिलाफ सख्त और स्पष्ट रुख अपनाना।
3. ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा को मजबूत बनाना।
जी-20 बैठक से पहले जयशंकर ने हिंद-प्रशांत द्वीप समूह सहयोग मंच को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि भारत की प्राथमिकता स्वास्थ्य सेवा, आईटी, क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना है।
भारत और प्रशांत द्वीपीय देशों की विकास साझेदारी को उन्होंने जन-केंद्रित एजेंडा करार दिया। इससे छोटे देशों को न केवल तकनीकी सहयोग मिलेगा, बल्कि मानव संसाधन के विकास का अवसर भी मिलेगा।
संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान आयोजित एक कार्यक्रम में जयशंकर ने भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती और अवसर पर बात की।
उन्होंने कहा, “आज की बदलती दुनिया में वैश्विक कार्यबल की आवश्यकता अनिवार्य है। कई देशों की जनसांख्यिकी ऐसी है कि वे अपनी मांग को स्थानीय स्तर पर पूरा नहीं कर सकते। ऐसे में प्रशिक्षित और कुशल वैश्विक कार्यबल ही समाधान है।”
जयशंकर ने जोर देकर कहा कि इस कार्यबल को आधुनिक, कुशल और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य बनाना होगा। यह तभी संभव है जब देश मिलकर शिक्षा, प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग को प्राथमिकता दें।
जयशंकर का पूरा संबोधन एक बात पर केंद्रित था दोहरे मानदंड छोड़कर न्यायपूर्ण रवैया अपनाना होगा। उन्होंने साफ किया कि शांति और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि विकास को बाधित किया गया, तो शांति की नींव कभी मजबूत नहीं हो पाएगी।
भारत ने इस मंच से यह संदेश दिया कि दुनिया की स्थिरता, सुरक्षा और प्रगति का रास्ता सिर्फ संवाद, कूटनीति और सहयोग से ही निकलेगा।
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