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Narmadapuram News: GPS Tracking Rolled Out for Inmates During Court and Medical Transfers in Central Jail
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Narmadapuram News: पेशी पर जाने वाले बंदियों पर जीपीएस की पैनी नजर, जेल में इलेक्ट्रॉनिक ट्रैकिंग सिस्टम लागू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नर्मदापुरम Published by: नर्मदापुरम ब्यूरो Updated Mon, 16 Feb 2026 12:43 PM IST
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नर्मदापुरम केंद्रीय जेल नर्मदापुरम अब तकनीक की क्रांति की मिसाल बन चुकी है। यह देश की पहली ऐसी जेल बन गई है, जहां मेडिकल उपचार या कोर्ट पेशी के लिए ले जाए जाने वाले बंदियों की हर गतिविधि जीपीएस आधारित इलेक्ट्रॉनिक निगरानी प्रणाली के माध्यम से ट्रैक की जा रही है। दो साल की मेहनत और परीक्षण के बाद जेल प्रशासन ने इस उच्च तकनीक ट्रैकिंग सिस्टम को प्रायोगिक तौर पर लागू भी कर दिया है। इस ट्रैकिंग सिस्टम को EPTS नाम दिया गया है।
दरअसल प्रदेश में हर साल 25 से 50 बंदी पुलिस या जेल गार्ड की निगरानी से फरार हो जाते हैं। कई बार बंदियों ने हथकड़ी छुड़ाकर भागने की घटनाएं अंजाम दी हैं, जिससे जेल प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठते रहे हैं। इन्हीं घटनाओं को ध्यान में रखते हुए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया गया। अधिकारियों का कहना है कि इस इलेक्ट्रॉनिक निगरानी प्रणाली के लागू होने के बाद पेशी या अस्पताल ले जाए जाने वाले बंदियों की गतिविधियों पर पूरी तरह नियंत्रण रखा जा रहा है और फरारी की संभावना लगभग शून्य हो गई हैं।
EPTS डिवाइस सिम आधारित जीपीएस तकनीक पर काम करती है और सीधे सैटेलाइट से जुड़ी रहती है। इससे बंदी की लाइव लोकेशन लगातार सर्वर और पंजीकृत मोबाइल पर अपडेट होती रहती है। डिवाइस को बंदी के हाथ या पैर में सुरक्षित रूप से बांधा जाता है।
इस प्रणाली के माध्यम से बंदी कब चला, कब रुका, कितनी रफ्तार से आगे बढ़ा और कितनी दूरी तय की, इसका पूरा रिकॉर्ड देखा जा सकता है। यदि बंदी किसी वाहन का उपयोग करता है तो वाहन के स्टार्ट और बंद होने की जानकारी भी प्रशासन को तुरंत मिल जाती है। डिवाइस से छेड़छाड़ या बैटरी समाप्त होने पर तुरंत अलर्ट मैसेज और अंतिम लोकेशन सिस्टम में दर्ज हो जाती है। पूरा ट्रैक रिकॉर्ड हिस्ट्री में सुरक्षित रखा जाता है, ताकि जांच या समीक्षा के लिए उपयोग किया जा सके।
मूल डिवाइस का वजन मात्र 150 ग्राम है। इसे सुरक्षित और तोड़फोड़ से बचाने के लिए 2 मिमी मोटी मेटल शीट का कवर लगाया गया है, जिससे कुल वजन लगभग 400 ग्राम हो जाता है। यह डिवाइस वाटर प्रूफ और शॉकप्रूफ है तथा न्यूमेरिक लॉक कोड से सुरक्षित है। बैटरी बैकअप 9 से 10 दिन तक चलता है और इसकी अनुमानित कीमत 4 से 10 हजार रुपये प्रति यूनिट है।
जेल अधीक्षक संतोष सोलंकी और सहायक जेल अधीक्षक हितेश बंडिया के मार्गदर्शन में इस प्रणाली का प्रायोगिक परीक्षण पहले स्टाफ पर किया गया। परीक्षण में डिवाइस ने हर चाल, गति, रुकावट और लाइव लोकेशन सहित सभी पैरामीटर को सटीक रूप से रिकॉर्ड किया। सफल परीक्षण के बाद अब इसे प्रायोगिक तौर पर बंदियों पर लागू भी कर दिया गया है।
सिस्टम लागू होने के बाद केंद्रीय जेल नर्मदापुरम देश की पहली जेल बन चुकी है, जहां बंदियों पर सैटेलाइट आधारित इलेक्ट्रॉनिक निगरानी प्रभावी रूप से लागू है। अधिकारियों का कहना है कि यह कदम केवल जेल सुरक्षा के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की कानून व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित होगा। इससे फरारी की घटनाओं पर रोक लगेगी और प्रशासन को वास्तविक समय का सटीक डेटा मिलेगा।
अधिकारियों के अनुसार यह डिवाइस जेल स्टाफ के लिए भी बेहद मददगार है। अब किसी बंदी के अस्पताल या कोर्ट जाने पर स्टाफ को लगातार उसके स्थान की जानकारी मिलती रहती है, जिससे निगरानी और नियंत्रण आसान हो गया है। किसी भी संभावित फरारी की स्थिति में प्रशासन के पास तुरंत कार्रवाई का अवसर रहता है।
भविष्य में इस प्रणाली को और उन्नत बनाने की योजना है। डिवाइस के साथ सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन में डैशबोर्ड तैयार किया गया है, जहां से बंदियों की हर गतिविधि, अलर्ट, बैटरी स्टेटस और लोकेशन को आसानी से ट्रैक किया जा सकता है। इस प्रणाली से न केवल बंदियों की निगरानी सुनिश्चित हुई है, बल्कि जेल स्टाफ का काम भी अधिक सटीक और सुरक्षित हो गया है। जेल प्रशासन ने इसे सुरक्षा में तकनीक का बड़ा कदम बताया है और उम्मीद जताई है कि आने वाले समय में अन्य जेलें भी इस मॉडल को अपनाने के लिए प्रेरित होंगी।
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