वर्तमान सदी का सबसे भयानक समय जनमानस ने कोविड काल में देखा, जब प्रत्येक इंसान इस महामारी और इससे होने वाली मौत से भयभीत था। लोग घरों में कैद होकर रह गए थे तथा हर चेहरे पर मौत का खौफ नजर आता था। कोरोना के इस भयानक दौर में सारे संस्थान बंद हो गए थे, नौनिहालों से लेकर युवा वर्ग की पढ़ाई-लिखाई मोबाइल में सिमटने लगी थी। तब सागर जिले के एक शिक्षक ने अपनी जान पर खेल कर एक नवाचार किया था और उनके इस प्रयास से वह बच्चे भी शिक्षा से मरहूम नहीं रहे थे, जो सुविधा विहीन थे। इस शिक्षक का नाम है चंद्रहास श्रीवास्तव, जिसने अपनी दोपहिया वाहन को एक चलते फिरते स्कूल में तब्दील कर दिया था।
मन में संकल्प और करने की इच्छा जब जागृत हो तो हर कार्य संभव है। इस बात को सार्थक किया था शासकीय प्राथमिक शाला रिछोड़ा टापरा के शिक्षक चंद्रहास श्रीवास्तव। इस प्राथमिक शिक्षक द्वारा पूरे लॉकडाउन के दौरान अपने दो पहिया वाहन से सवारी कर अपना शिक्षक धर्म निभाया। शिक्षक ने अपने स्कूटर को ऐसा स्वरूप दिया था कि उसमें एक छोटा पुस्तकालय सहित पढ़ने पढ़ाने का लगभग प्रत्येक सामान मौजूद रहता था। कोरोना काल में जब सारे देश में लॉकडाउन और अन्य प्रतिबंधों के चलते जहां स्कूल कॉलेज बंद हो गए थे, बच्चों की शैक्षणिक गतिविधिया थम गई थी। कुछ महीनों बाद स्थितियां थोड़ी सामान्य जरूर हुई थी, पर विद्यालय बंद रहे। स्कूलों में ऑनलाइन कक्षाएं भले ही प्रारंभ हो गई थी, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रो में पढ़ने बाले गरीब विद्यार्थियों के पास इसके लिए मोबाइल तथा अन्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं थे। तब ऐसे विद्यार्थियों की परेशानी तथा दर्द को समझ इस शिक्षक ने उन्हें पढ़ाने की ठानी।
उन्होंने शैक्षणिक गतिविधियों को अपने वाहन में तैयार करा कर शहर के दूरस्थ अंचलों में जाकर न केवल शिक्षा का प्रचार-प्रसार कर बच्चों को शिक्षा दी। बल्कि उन्होंने गांव में जाकर चबूतरा क्लास मोहल्ला क्लास जैसी गतिविधियों से बच्चों की पढ़ाई जारी रखी और इसके साथ-साथ निशुल्क अपने स्वयं के खर्च पर लोगों को मास्क का वितरण भी उन्होंने किया था। चंद्रहास श्रीवास्तव ने लगभग 10 महीने तक बच्चों के बीच घूम-घूम कर शैक्षणिक कार्य करवाया था। आप इस शिक्षक के वाहन को देखिए, जिसे इन्होंने चलता फिरता पुस्तकालय बना रखा था। इस गाड़ी के एक तरफ बोर्ड भी लगा है।
चंद्रहास श्रीवास्तव वर्तमान में सागर के पास ग्राम रिछोड़ा के प्राथमिक विद्यालय में पदस्थ हैं। जहां वे नियमित शैक्षणिक गतिविधियां चला रहे हैं। कोरोना के उस भयावह दौर में उन्हें जब समय मिलता था तो शहर की उन बस्तियों में पहुंच जाते थे, जहां के बच्चे न तो ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे थे और न ही साधन संपन्न थे। वहां जाकर भी इस शिक्षक ने शिक्षा दान दिया था। शिक्षक द्वारा किये गए नेक प्रयासों की बच्चों के अलावा उनके अभिभावक भी सराहना करते थे। ऐसे शिक्षक ही शिक्षक दिवस के सही अर्थों में प्रतीक हैं।