मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के बुधनी क्षेत्र में अवैध शराब का काला कारोबार अब कानून को खुली चुनौती देता नजर आ रहा है। सरकार ने नर्मदा तटों पर शराब बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध का निर्णय लिया था, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। गांव-गांव में कच्ची और पक्की शराब का जाल बिछ चुका है।
यह सिर्फ कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने पर सीधा हमला है। ग्राम पिपलानी और फुंदकी सहित आसपास के गांवों में खुलेआम शराब बिक रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि शराब माफिया बेखौफ हैं और उन्हें कहीं न कहीं संरक्षण प्राप्त है।
थाने में हल्ला बोल, महिलाओं का फूटा गुस्सा
ग्राम पिपलानी और फुंदकी की महिलाएं बड़ी संख्या में गोपालपुर थाने पहुंचीं। हाथों में तख्तियां, आंखों में आक्रोश और दिल में दर्द लिए इन महिलाओं ने थाने का घेराव कर दिया। महिलाओं ने थाना प्रभारी को ज्ञापन सौंपते हुए साफ कहा कि यदि गांव में बिक रही अवैध शराब पर तत्काल कार्रवाई नहीं हुई तो वह सड़क पर उतरकर बड़ा आंदोलन करेंगी। प्रदर्शन के दौरान जोरदार नारेबाजी की गई और शराब माफिया के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग उठी।
महिलाएं बोलीं-शराब ने उजाड़ दिए हमारे घर
कला बाई, आशा बाई सहित कई महिलाओं ने पुलिस के सामने अपनी आपबीती सुनाई। उनका कहना था कि शराब ने उनके परिवारों की खुशियां छीन ली हैं। पुरुष मजदूरी की पूरी कमाई शराब में उड़ा देते हैं। घर लौटकर नशे में मारपीट करते हैं। कई बार जलती लकड़ियों, पत्थरों और दरांती तक से हमला किया जाता है। महिलाओं का आरोप है कि रोजाना घरेलू हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं और बच्चों का भविष्य अंधकार में जा रहा है।
डायरी सिस्टम और होम डिलीवरी का खेल
महिलाओं ने चौंकाने वाला खुलासा किया कि गांवों में “डायरी सिस्टम” से अवैध शराब की सप्लाई हो रही है। मोबाइल पर ऑर्डर और घर तक डिलीवरी।यह नेटवर्क इतना मजबूत है कि बिना लाइसेंस के भी हर गली में शराब उपलब्ध है। किराना दुकानों और घरों से शराब बेची जा रही है। इससे साफ है कि शराब माफिया ने जमीनी स्तर पर गहरी पकड़ बना ली है। युवाओं को उधार में शराब दी जाती है और बाद में वसूली की जाती है।
नशे की चपेट में मासूम बचपन
गांवों में सिर्फ बड़े ही नहीं, बल्कि किशोर और बच्चे भी नशे की गिरफ्त में आ रहे हैं। महिलाओं का कहना है कि जर्दा पाउच और अन्य नशे के उत्पादों की आसान उपलब्धता ने बच्चों को भी लती बना दिया है।
जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, उस उम्र में वे नशे के जाल में फंसते जा रहे हैं। स्कूल छोड़ने की घटनाएं बढ़ रही हैं और अपराध की प्रवृत्ति पनप रही है।
आबकारी विभाग पर उठे गंभीर सवाल
इस पूरे मामले में आबकारी विभाग की भूमिका कटघरे में है। ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग आंख मूंदे बैठा है। गांव में हर व्यक्ति जानता है कि शराब कहां बनती और बिकती है, लेकिन अधिकारियों को भनक तक नहीं। लोगों का आरोप है कि यदि सख्ती से कार्रवाई की जाए तो एक सप्ताह में पूरा नेटवर्क ध्वस्त हो सकता है। लेकिन निरीक्षण तक नहीं किया जा रहा। इससे संरक्षण और सांठगांठ की आशंका गहराती जा रही है।
नर्मदा की पवित्रता पर भी सवाल
बुधनी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा मां नर्मदा के तट से लगा है। सरकार ने पवित्र तटों पर शराब बिक्री पर प्रतिबंध का वादा किया था। लेकिन जमीनी हकीकत में नर्मदा किनारे बसे गांवों में शराब खुलेआम बिक रही है।
महिलाओं का कहना है कि यह सिर्फ कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था का भी अपमान है।
अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान
ग्राम पंचायत पिपलानी की महिलाओं ने प्रशासन को एक सप्ताह का अल्टीमेटम दिया है। यदि इस अवधि में गांव में शराब बिक्री पूरी तरह बंद नहीं हुई तो महिलाएं उग्र आंदोलन करेंगी। चक्काजाम, धरना और जिला मुख्यालय तक मार्च की चेतावनी दी गई है। महिलाओं का कहना है कि वे आर्थिक और मानसिक रूप से टूट चुकी हैं, अब चुप नहीं बैठेंगी।
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लगातार बढ़ रहा विरोध का दायरा
इससे पहले ग्राम बासुदेव, पांचौर, इटावा, सेमलपानी, गिल्लौर, राला, अकावलिया और चीटीखेड़ा की महिलाएं भी शराबबंदी की मांग को लेकर आंदोलन कर चुकी हैं। ग्राम पंचायत राला की सरपंच ममता बजाज के नेतृत्व में भी प्रदर्शन हुआ था। अब यह आंदोलन पूरे आदिवासी अंचल में फैलता दिख रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन शराब माफिया के नेटवर्क को तोड़ पाएगा या महिलाओं को ही सड़क पर उतरकर लड़ाई लड़नी पड़ेगी? ग्रामीण इलाकों में फैलता अवैध शराब का जहर अब सामाजिक विस्फोट का कारण बन सकता है। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो यह आंदोलन उग्र रूप ले सकता है।