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हिरण्यकश्यप की पत्नी कयाधू ने अमेठी के नेवादा में की थी घोर तपस्या, ग्राउंड रिपोर्ट
यूपी के अमेठी में मुसाफिरखाना का नेवादा गांव कयाधू नदी के तट पर स्थित एक ऐसा स्थल है, जहां आस्था, इतिहास और पौराणिक मान्यताएं एक-दूसरे में घुली दिखाई देती हैं। वर्षों से यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है और क्षेत्र में ‘मृत्यु-हरण स्थान’ के रूप में विशेष पहचान रखता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, असुरराज हिरण्यकश्यप की पत्नी कयाधू ने इसी स्थल पर अपने पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी साधना से प्रसन्न होकर देवी ने इस क्षेत्र को जागृत किया। मान्यता है कि उसी कालखंड से जुड़े मंदिरों की प्रतिमाएं और संरचनाओं के अवशेष आज भी यहां बिखरे पड़े हैं।
नदी किनारे दिखाई देने वाले विशाल पत्थर प्राचीन स्थापत्य के अवशेष माने जाते हैं, जो इस क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की गवाही देते हैं। किंवदंती के अनुसार, देवराज इंद्र जब गर्भवती कयाधू को बंदी बनाकर ले जा रहे थे, तभी मार्ग में उनकी भेंट देवर्षि नारद से हुई। इसके बाद कयाधू को महर्षि नारद के आश्रम में छोड़ दिया गया।
देवर्षि नारद से जुड़ा धाम आज भी क्याधू नदी के तट पर नेवादा गांव से कुछ दूरी पर स्थित है, जहां एक प्राचीन शिवालय मौजूद है। इसी पौराणिक प्रसंग के आधार पर नदी का नाम ‘क्याधू’ प्रचलन में आया। कालांतर में यह स्थल ‘मृत्यु-हरण स्थान’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। मंदिर परिसर की विशेष पहचान यहां से निरंतर निकलने वाली जलधारा है, जिसे श्रद्धालु अत्यंत पवित्र मानते हैं।
मान्यता है कि नदी में स्थित प्राचीन मंदिर अवशेषों के नीचे से आज भी जलधारा प्रवाहित होती रहती है। वर्तमान में मंदिर के पुजारी देवानंद महाराज वर्ष 2006 से सेवा दे रहे हैं। उनसे पूर्व सेवा करने वाले पुजारियों की समाधियां भी परिसर में स्थित हैं। यहां मौजूद प्राचीन कुएं भी ऐतिहासिक स्मृतियों को संजोए हुए हैं। ग्रामीण समय-समय पर भागवत कथा, सुंदरकांड पाठ और भंडारों का आयोजन करते हैं।
मंदिर सेवा में लगे पुजारी के लिए ग्रामीण नियमित रूप से भोजन भी भेजते हैं। आज यह स्थल अपभ्रंश नाम से ‘मूर्तिहीन भवानी मंदिर’ के रूप में जाना जाता है। क्याधू नदी का यह पवित्र तट न केवल पौराणिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि अमेठी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत रूप में सहेज कर रखे हुए है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार नदी में मौजूद प्राचीन मंदिर अवशेषों के नीचे से निकलने वाली जलधारा आज भी सक्रिय है। यही कारण है कि यह स्थल धार्मिक के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्व भी रखता है। ग्रामीण यहां धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से पीढ़ियों से आस्था की परंपरा निभा रहे हैं।
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