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Devprayag Sanskrit University teachers risked their lives to extinguish a forest fire spanning 50 hectares
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देवप्रयाग में संस्कृत विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने जान जोखिम में डालकर बुझाई 50 हेक्टेयर जंगल की आग
Renu Saklani
Updated Sat, 23 May 2026 01:58 PM IST
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केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर के अध्यापकों ने जान जोखिम में डालकर करीब 50 हेक्टेयर जंगल में लगी भीषण आग को बुझाया है। पौड़ी के सबदरखाल की ओर से लगी यह आग अलकनंदा के बायें किनारे पर बसे विश्वविद्यालय परिसर की तरफ तेजी से बढ़ रही थी, जिससे चीड़ के पेड़ों से उठती लपटों और भारी धुएं के कारण परिसर में पूरी तरह अफरातफरी और घुटनभरा माहौल बन गया। परिसर प्रशासन द्वारा वन विभाग को सूचित करने पर वहां से महज दो फॉरेस्ट गार्ड भेजे गए, लेकिन नृसिंहाचल की खड़ी चढ़ाई और रास्ता न होने के कारण वनकर्मी असमंजस में पड़ गए। ऐसी विकट स्थिति को देखते हुए परिसर के निदेशक प्रो. पीवीबी सुब्रह्मण्यम ने तुरंत परिसर और बालगुरुकुल के अध्यापकों की एक टीम तैयार की और स्वयं उसका नेतृत्व करते हुए रवाना हुए। टीम के सदस्यों ने परिसर की लगभग 12 फुट ऊंची बाउंड्रीवाल को किसी तरह पार किया और बेहद कठिन परिस्थितियों में करीब डेढ़ घंटे की चढ़ाई चढ़कर नृसिंह मंदिर के नीचे घटनास्थल पर पहुंचे, जहां चीड़ की पत्तियों, बीजों और सूखी घास के कारण आग विकराल रूप ले चुकी थी।
वहां मौजूद वन विभाग के कर्मचारियों नरोत्तम प्रसाद और मुकेश नेगी के निर्देशन में अध्यापकों ने मोर्चा संभाला। तीखे ढाल, चीड़ की सूखी पत्तियों की फिसलन और अचानक बढ़ते अंधेरे के कारण आग पर काबू पाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया था, लेकिन पूरी टीम ने शाम छह बजे से रात दस बजे तक लगातार मोर्चा संभाले रखा। इस दौरान फिसलने और कांटे चुभने से कुछ अध्यापक घायल भी हुए, वहीं घटनास्थल पर कई पक्षी जले और अधजली अवस्था में मिले। भारी मशक्कत के बाद लगभग 50 हेक्टेयर जंगल की आग को शांत कर श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर को सुरक्षित बचा लिया गया, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी। आग बुझाने के बाद बिना संसाधनों के यह टीम घने जंगल में रास्ता भटक गई। पानी की कमी और घने अंधेरे के कारण एक कदम चलना भी दूभर हो गया था, जिसके बाद टीम ने खेड़ा गांव की ओर शरण लेने का प्रयास किया, परंतु वहां भी रास्ता भटकने के बाद किसी तरह रात करीब 10 बजे सभी सदस्य सुरक्षित परिसर वापस लौटे। इस साहसिक मुहिम में डॉ. वीरेंद्र सिंह बर्त्वाल, डॉ. सुरेश शर्मा, डॉ. सुखदेव सिंह, डॉ. प्रदीप कुमार, डॉ. सूर्यकांत चौबे, करुण कुमार, दिगंबर रतूड़ी, सुनील गोदियाल और संपदा अधिकारी उमाकांत भट्ट शामिल रहे।
गौरतलब है कि वर्ष 2024 में भी परिसर के तीनों ओर भारी आग लगी थी, तब भवनों की छतों से अग्निशमन यंत्रों के जरिए मुश्किल से बचाव हुआ था, फिर भी बिजली के केबल जलने से करीब 30 लाख रुपये का नुकसान झेलना पड़ा था। इस संबंध में निदेशक प्रो. सुब्रह्मण्यम ने कहा कि बिना संसाधनों के अध्यापकों ने जिस जोश और जुनून के साथ यह साहसिक कार्य किया है, वह बेहद प्रशंसनीय, प्रेरणादायक और परिसर के प्रति उनकी गहन श्रद्धा का प्रमाण है। उन्होंने घोषणा की कि दावानल की बार-बार होने वाली घटनाओं को देखते हुए अब जंगल से लगती परिसर की सीमा पर सीमेंट का लगभग 18 फुट चौड़ा मार्ग बनाया जाएगा, ताकि आग को परिसर में आने से रोका जा सके और अगले छह महीनों में प्रकृति के अनुकूल ऐसी पुख्ता व्यवस्थाएं की जाएंगी जिससे परिसर पूरी तरह सुरक्षित रहे। वहीं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने भी प्रो. सुब्रह्मण्यम के मार्गदर्शन और अध्यापकों की टीम के इस अदम्य साहस की सराहना करते हुए पूरी टीम को बधाई दी है।
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