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Agra Hospital Fire: कंपाउंडर से बने अस्पताल संचालक, बेटे को डॉक्टर, बेटी को इंजीनियर बनाने का था सपना

अमर उजाला ब्यूरो, आगरा Published by: धीरेन्द्र सिंह Updated Thu, 06 Oct 2022 08:39 AM IST
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Agra hospital fire dream was to make son a doctor daughter to be an engineer
आग की चपेट में आकर डॉक्टर, उनकी बेटी और बेटे की मौत - फोटो : अमर उजाला
आगरा के शाहगंज के नरीपुरा में आर मधुराज हॉस्पिटल में आग लगने की घटना में डायरेक्टर राजन (42), उनकी बेटी सिमरन उर्फ शालू (18) और बेटे ऋषि (15) की मौत हो गई। घटना के बाद परिवार में कोहराम मचा हुआ है। राजन सिंह ने मेहनत से एक मुकाम हासिल किया था। वह डॉक्टर नहीं बन सके थे। मगर, अस्पतलों में कंपाउंडर की नौकरी करके अपना हॉस्पिटल खोल लिया। गरीब मरीजों की मदद के लिए आगे रहते थे। बेटे को डॉक्टर तो बेटी को इंजीनियर बनाने का सपना देख रहे थे। अब परिवार के लोगों को उनके बड़े बेटे और पत्नी की चिंता सता रही है। वह भी अस्पताल में भर्ती हैं।


गोपीचंद नरीपुरा स्थित पुरानी आबादी के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि उनके तीन बेटे राजन, राजू और मनोज थे। वह खुद किसान थे। मगर, कुछ साल से मोहल्ले के पास ही जूता मैटेरियल की दुकान चलाते हैं। इसका सामान ही अस्पताल के ऊपर बनी दुकान में रखा हुआ था। इसमें फोम भी शामिल थी। 30 साल पहले परिवार में एक साथ चार लोगों की मौत हो गई थी। इसलिए उन्होंने सोचा कि बेटा डॉक्टर बन जाए।
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अस्पताल संचालक राजन के पिता गोपीचंद - फोटो : अमर उजाला
 राजन सबसे बड़ा होने के कारण पढ़ाई में भी अव्वल था। उसने बीए किया था। वह एक परिचित के संपर्क में आया। उसने उसे एक होम्योपैथिक डॉक्टर के क्लीनिक पर कंपाउंडर की नौकरी पर लगा दिया।
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घटना के अस्पताल के बाहर खड़े लोग - फोटो : अमर उजाला
कुछ साल बाद वो शहर के बड़े अस्पताल में नौकरी करने  लगा। इससे कई डॉक्टरों के संपर्क में आ गया। 25 साल तक मेहनत के साथ नौकरी की। वर्ष 2016 में घर के पास ही 400 वर्ग जमीन में भवन बनाया। इसमें अस्पताल खोल लिया। इस अस्पताल में कई डॉक्टर अपनी सेवाएं देते हैं।
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आर मधुराज अस्पताल में लगी थी आग - फोटो : अमर उजाला
राजन आपातकालीन स्थिति में आने वाले मरीज को देखते थे। प्राथमिक उपचार करते थे। लोगों की मदद भी करते थे। इससे मरीज उनसे जुड़ा रहता था। हर कोई उन्हें डॉक्टर कहता था।
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अस्पताल में जला पड़ा सामान - फोटो : अमर उजाला
राजन बड़े बेटे लवी को डॉक्टर बनाना चाहते थे, जिससे वह हास्पिटल को संभाल सके। इसके लिए उसे तैयारी करा रहे थे। उसने नीट की परीक्षा भी पास कर ली थी। अब उसकी काउंसिलिंग होने वाली थी। इससे परिवार में खुशी का माहौल था। 
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