सब जग होरी ब्रज में होरा की कहावत यूं ही नहीं है। ब्रज में होली का अद्भुत आनंद है। यहां जितने दिन की होली होती है, उतने ही होली के रूप व रंग देखने को मिलते हैं। इस 40 दिवसीय उत्सव में कहीं लड्डू और फूलों की होली होती है तो कहीं लाठियों से रंग बरसता है। कपड़े फाड़कर कोड़ों की बरसात के साथ मंदिरों में रसिया गायन के बीच अबीर-गुलाल की सतरंगी छटा देखते ही बनती है। होली के इस अद्भुत रूप व रंग के दर्शन के लिए देश ही नहीं विदेशों से भी कृष्ण भक्त यहां आने शुरू हो चुके हैं।
{"_id":"6210cbdf83af4a31872ab405","slug":"mathura-holi-celebration-starts-barsana-holi-2022-schedule-in-braj","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"ब्रज की होली के रंग: कहीं बरस रहे फूल, कहीं उड़ रहा अबीर-गुलाल, जानिए कब खेली जाएगी लठमार होली","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
ब्रज की होली के रंग: कहीं बरस रहे फूल, कहीं उड़ रहा अबीर-गुलाल, जानिए कब खेली जाएगी लठमार होली
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
Published by: मुकेश कुमार
Updated Sun, 20 Feb 2022 02:48 PM IST
विज्ञापन
ब्रज की लठमार होली (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
Trending Videos
लड्डू होली (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
लड्डू होली: ये होली सिर्फ बरसाना में ही देखने को मिलती है। यहां लठामार होली से एक दिन पहले लड्डू होली राधारानी मंदिर में होती है। इसमें लड्डू बरसाए जाते हैं।
लठमार होली: फागुन मास की नवमी को बरसाना और दशमी को नंदगांव में लठमार होली होती है। इसमें हुरियारिन, हुरियारों पर लाठियां बरसाती हैं। हुरियारे भी उन प्रहारों को हंसते गाते और हंसी-ठिठोली करते ढालों पर सहते हैं।
रसिया होली: ब्रज के गांव-गांव में होली पर रसिया गायन की परंपरा है। इसमें रसिया टोली नाचती-गायन करती है। महिलाएं भी इसमें सहभागी बनती हैं। नृत्य की भाव भंगिमाएं दर्शकों को स्वत: ही आकर्षित करती हैं।
लठमार होली: फागुन मास की नवमी को बरसाना और दशमी को नंदगांव में लठमार होली होती है। इसमें हुरियारिन, हुरियारों पर लाठियां बरसाती हैं। हुरियारे भी उन प्रहारों को हंसते गाते और हंसी-ठिठोली करते ढालों पर सहते हैं।
रसिया होली: ब्रज के गांव-गांव में होली पर रसिया गायन की परंपरा है। इसमें रसिया टोली नाचती-गायन करती है। महिलाएं भी इसमें सहभागी बनती हैं। नृत्य की भाव भंगिमाएं दर्शकों को स्वत: ही आकर्षित करती हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
फूलों की होली (फाइल)
- फोटो : अमर उजाला
फूल होली: आमतौर पर यह होली ब्रज में किसी विशेष स्थान पर नहीं होती है। फागुन मास में धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में फूलों की होली खास रहती है। इसमें फूलों की पंखुड़ियों को गुलाल के स्थान पर बरसाया जाता है।
छड़ी मार होली: यह होली गोकुल में खेली जाती है। हुरियारिन, हुरियारों पर छड़ियों से प्रहार करती हैं। हुरियारे इन छड़ियों से अपना बचाव करते हैं। यहां आसपास के विभिन्न गांवों में भी इस प्रकार की होली देखने को मिलती है।
रंग-अबीर गुलाल की होली: यह होली संपूर्ण ब्रज में खेली जाती है। खासकर रंगभरनी एकादशी से पूर्णिमा तक मथुरा-वृंदावन में श्रीकृष्ण जन्मस्थान, श्रीद्वारिकाधीश, श्रीबांकेबिहारी, श्रीराधावल्लभ, श्रीराधारमण आदि मंदिरों में रंग-अबीर-गुलाल बरसाया जाता है।
छड़ी मार होली: यह होली गोकुल में खेली जाती है। हुरियारिन, हुरियारों पर छड़ियों से प्रहार करती हैं। हुरियारे इन छड़ियों से अपना बचाव करते हैं। यहां आसपास के विभिन्न गांवों में भी इस प्रकार की होली देखने को मिलती है।
रंग-अबीर गुलाल की होली: यह होली संपूर्ण ब्रज में खेली जाती है। खासकर रंगभरनी एकादशी से पूर्णिमा तक मथुरा-वृंदावन में श्रीकृष्ण जन्मस्थान, श्रीद्वारिकाधीश, श्रीबांकेबिहारी, श्रीराधावल्लभ, श्रीराधारमण आदि मंदिरों में रंग-अबीर-गुलाल बरसाया जाता है।
हुरंगा
- फोटो : अमर उजाला
हुरंगा: प्राय: धूल के बाद हुरंगा होता है। खासकर बलदेव का हुरंगा प्रख्यात है। इसमें हुरियारिन हुरियारों के कपडे़ फाड़कर उन्हीं से बनाए कोड़ों का प्रयोग करती हैं। यह आयोजन नंदगांव, गिडोह, बठैन, जाब सहित अनेक गांवों में भी देखने को मिलता है।
चरकुला नृत्य: गोवर्धन के समीपवर्ती गांव मुखराई में चरकुला नृत्य का आयोजन होता है। महिलाएं पहिएनुमा चक्र पर सैकड़ों दीपक जलाकर नृत्य करती हैं। चरकुला नृत्य की विदेशों में भी पहचान है।
साखी की होली: इस होली में साखियों का गायन किया जाता है जो द्विअर्थी हो। साखियों को विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों के साथ गाया जाता है। इस पर पुरुष और महिलाएं साखी अनुरूप भाग भंगिमाएं नृत्य में करके दर्शकों को लुभाते हैं। अब इस प्रकार की होली यदा-कदा ही देखने को मिलती है।
चरकुला नृत्य: गोवर्धन के समीपवर्ती गांव मुखराई में चरकुला नृत्य का आयोजन होता है। महिलाएं पहिएनुमा चक्र पर सैकड़ों दीपक जलाकर नृत्य करती हैं। चरकुला नृत्य की विदेशों में भी पहचान है।
साखी की होली: इस होली में साखियों का गायन किया जाता है जो द्विअर्थी हो। साखियों को विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों के साथ गाया जाता है। इस पर पुरुष और महिलाएं साखी अनुरूप भाग भंगिमाएं नृत्य में करके दर्शकों को लुभाते हैं। अब इस प्रकार की होली यदा-कदा ही देखने को मिलती है।
विज्ञापन
श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर होली के दौरान की तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
होली के प्रमुख आयोजन
- 10 मार्च : लड्डू होली बरसाना।
- 11 मार्च : बरसाना की लठामार होली।
- 12 मार्च : नंदगांव की लठामार होली।
- 14 मार्च : श्रीकृष्ण जन्मभूमि, मथुरा होली।
- 14 मार्च : श्रीद्वारिकाधीश, मथुरा होली।
- 14 मार्च : श्रीबांकेबिहारी, वृंदावन होली।
- 16 मार्च : छड़ीमार होली, गोकुल।
- 18 मार्च : होली का ढोला, मथुरा।
- 20 मार्च : हुरंगा, बलदेव।