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Aligarh News: सराय हकीम गोलीकांड के 47 दिन बाद आरोपी को मिली राहत, मामले में पहली जमानत हाईकोर्ट से मंजूर

अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़ Published by: Chaman Kumar Sharma Updated Fri, 01 May 2026 10:15 AM IST
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सार

जमानत के साथ कोर्ट ने कहा है कि आरोपी गवाहों को डराने या प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेगा। ट्रायल के दौरान महत्वपूर्ण तारीखों (आरोप तय होना, बयान दर्ज होना आदि) पर उसे अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहना होगा।

High Court grants first bail in Sarai Hakim firing case
जमानत अर्जी मंजूर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

अलीगढ़ में थाना बन्ना देवी क्षेत्र के सराय हकीम में 12 मार्च 2026 को सरेशाम हुई फायरिंग की घटना में आरोपी यश गुप्ता की जमानत याचिका को हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया है। न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की पीठ ने मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद यह आदेश पारित किया। इस तरह घटना के 47 दिन बाद आरोपी को राहत मिली है। मामले के अन्य सभी आरोपी अभी जेल में हैं।

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सराय हकीम बाजार में हुई फायरिंग की घटना भाजयुमो से जुड़े दो गुटों के बीच आपसी रंजिश और वर्चस्व की लड़ाई के कारण हुई थी। यह विवाद हर्षद हिंदू और शशांक पंडित के गुटों के बीच हुआ था। फायरिंग में दोनों पक्षों के दो और एक राहगीर घायल हो गया था। मामले में 16 लोगों को जेल भेजा गया। इसमें यश गुप्ता के खिलाफ भी बन्नादेवी थाने में रिपोर्ट दर्ज है।
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आवेदक के अधिवक्ता ने कोर्ट में तर्क दिया कि यश गुप्ता को गलत तरीके से फंसाया गया है। उन्होंने दलील दी कि प्राथमिक सूचना रिपोर्ट के अनुसार दो समूहों के बीच संघर्ष हुआ था, लेकिन घायल पक्ष ने आवेदक की किसी विशिष्ट भूमिका का उल्लेख नहीं किया है। अदालत ने यश गुप्ता को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और उतनी ही राशि की दो प्रतिभूतियों पर रिहा करने का निर्देश दिया है।

जमानत के साथ कोर्ट ने कहा है कि आरोपी गवाहों को डराने या प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेगा। ट्रायल के दौरान महत्वपूर्ण तारीखों (आरोप तय होना, बयान दर्ज होना आदि) पर उसे अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहना होगा। गवाहों की उपस्थिति के दौरान कोर्ट से अनावश्यक स्थगन नहीं मांगेगा। यदि इनमें से किसी भी शर्त का उल्लंघन किया जाता है, तो यह जमानत रद्द करने का आधार माना जाएगा।

कानूनी और प्रक्रियात्मक दोनों स्तरों पर पड़ेगा प्रभाव
सराय हकीम फायरिंग जैसे गंभीर मामलों में, जहां कई आरोपी शामिल हों, एक को जमानत मिलने का प्रभाव कानूनी और प्रक्रियात्मक दोनों स्तरों पर पड़ता है। कानून के जानकार कहते हैं कि यदि जेल में बंद किसी अन्य आरोपी की भूमिका ठीक वैसी ही है जैसी जमानत पाने वाले आरोपी की थी, तो वह अदालत में पैरिटी (समानता) का दावा कर सकता है। वकील यह तर्क दे सकते हैं कि चूंकि समान आरोपों और साक्ष्यों वाले व्यक्ति को जमानत मिल गई है, इसलिए उनके मुवक्किल को भी मिलनी चाहिए। यदि जमानत पाने वाला व्यक्ति वह था जो घटनास्थल पर मौजूद था लेकिन उसने गोली नहीं चलाई, तो इससे मुख्य शूटरों को कोई फायदा नहीं मिलेगा।

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