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कुंभ 2019: 'पेस मंत्र' सुनकर पूरी होती है संन्यास प्रक्रिया, अपना सबकुछ लुटा देते हैं संन्यासी
पंकज प्रसून, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: shubham
Updated Sun, 10 Feb 2019 07:23 PM IST
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देश और दुनिया के दूसरे देशों कुंभ क्षेत्र में आकर अपना सब कुछ लुटाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या भी कम नहीं है। गृहस्थ जीवन को त्यागकर संन्यासी बनने वाले हजारों लोग यहां अपना पिंडदान भी कर जाते हैं। इन सबके पीछे गुरु की तरफ संन्यासियों के कानों में बोला गया महावाक्य है, जो संंन्यासी बनने के बाद के जीवन का मूलमंत्र हो जाता है। इस महावाक्य को अखाड़ों की परंपरा में पेस मंत्र कहा जाता है।
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इस पेस मंत्र को पाने के लिए कई वर्ष पहले से ही अपने को संन्यासी परंपरा की जीवन शैली में ढालना होता है। संन्यासी बनने की प्रक्रिया से गुजर चुके शंकराचार्य परिषद के प्रमुख स्वामी आनंद स्वरूप ने बताया कि संन्यासी बनने से पहले कई वर्षों तक ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करना पड़ता है। इसके लिए वेदों, उपनिषदों का अध्ययन और अनुष्ठान करना होता है। यह सब करने के पीछे की वजह यह है कि जिससे संयासी बनने वाले के अंदर सभी तरह के विकार खतम हो जाएं।
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महामंडलेश्वर स्वामी यतींद्रानंद गिरि ने बताया कि संन्यास परंपरा में आने के लिए विकारों के साथ अपना सर्वस्व दान भी करना पड़ता है। कुंभ क्षेत्र में पिछले एक महीने के अंतराल में करीब 30 हजार गृहस्थ लोगों ने संन्यास धारण किया। संन्यास धारण करने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। यह तभी पूरी होती है जब गुरु के जरिए संन्यासी बनने वाले के कान में धीरे से एक शब्द बोलता है, जो महावाक्य होता है। इसे ही पेस मंत्र कहा जाता है।
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इस महावाक्य को सुनने से पहले संन्यासी बनने वाला अपने शरीर पर धारण किए हुए वस्त्र, आभूषण और धन इत्यादि सभी का दान कर देता है। अखाड़ों में संन्यासी बनाने की जो परंपरा है उसमें हर संन्यासी दान के रूप में अखाडा़ें को बड़ी रकम देता हैं। वैसे इसमें जो जितना सक्षम है उसी अनुसार दान करता है।
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शंकराचार्य से आचार्य महामंडलेश्वर तक आई परंपरा
अखाड़ों में संन्यासी बनने की प्रक्रिया में पेस मंत्र यानि महावाक्य देने का अधिकार शंराचार्य को होता था। बाद में अखाड़ों के आचार्य महामंडलेश्वर भी पेस मंत्र देने लगे। अब अखाड़ों के माध्यम से एक अस्थाई गुरू भी बनाया जाता है, जो संन्यासियों को महावाक्य देता है। अस्थाई गुरु अखाड़े अपने हिसाब से किसी महामंडलेश्वर या किसी संत को बनाते हैं। अस्थाई गुुरू के पेस मंत्र देने के बाद आचार्य महामंडलेश्वर संन्यासियों की पीठ पर थपकी मारकर उसे पूर्ण संन्यासी होने का अशीर्वाद देते हैं।
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