Hathras: अब जिला अस्पताल के प्लांट से ही भरेंगे ऑक्सीजन सिलिंडर, बाहर से भरवाने पर खर्च करने पड़ रहे 60 हजार
हाथरस जिला अस्पताल में प्लांट होते हुए भी ऑक्सीजन की सप्लाई सिलिंडर के माध्यम से की जा रही है। इसके लिए हर महीने बाहर से सिलिंडर रिफिल कराए जाते हैं, जिस पर अस्पताल को 50 से 60 हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
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हाथरस जिला अस्पताल में चार साल पहले बना ऑक्सीजन प्लांट अब मरीजों के काम आ सकेगा। प्लांट में बूस्टर पंप इंस्टॉल होने जा रहा है, जिससे तैयार ऑक्सीजन को सिलिंडरों में भरा जा सकेगा। जिला अस्पताल को बाहर से ऑक्सीजन नहीं खरीदनी पड़ेगी।
कोरोना के बाद हुई ऑक्सीजन की कमी के कारण हाथरस जिले में तीन ऑक्सीजन प्लांट की स्थापना हुई थी। जिला अस्पताल परिसर में टीबी अस्पताल को एल-टू कोरोना अस्पताल बनाया गया था, इसलिए यहां 996 लीटर पति मिनट की क्षमता वाला प्लांट स्थापित किया गया। अक्तूबर 2021 में स्थापित इस प्लांट में 80 लाख रुपये लागत आई थी। इसकी सीधी लाइन टीबी अस्पताल में तो है, लेकिन दूरी के कारण जिला अस्पताल के वार्ड व इमरजेंसी कक्ष तक इसकी सीधी आपूर्ति नहीं हो पा रही है।
पिछले दो साल से टीबी अस्पताल में मरीज भर्ती नहीं किए जा रहे। केवल डे-केयर में ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है, जिसकी पूर्ति सिलिंडर से कर ली जाती है। इस कारण प्लांट दो साल से क्रियाशील नहीं है। केवल समय-समय पर चलाकर देख लिया जाता है, जिससे मशीन खराब न हो। बूस्टर पंप लगाने के लिए जिला अस्पताल से लगातार पत्राचार किया जा रहा था। शासन ने हाथरस के साथ-साथ प्रदेश के कई जिलों में बूस्टर लगाने के लिए संस्था नामित की है। संस्था के अधिकारी टेक्नीशियन प्लांट का निरीक्षण कर चुके हैं। अगले सप्ताह तक यहां बूस्टर लगने की संभावना है।
ऑक्सीजन प्लांट पर बूस्टर लगने से सिलिंडर यहीं रिफिल किए जा सकेंगे, जिससे राजस्व व समय की बचत होगी। साथ ही मरीजों को गुणवत्ता पूर्ण ऑक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित होगी। जल्द ही पाइप लाइन के प्रस्ताव को भी मंजूरी मिलने की संभावना है।-डाॅ. सूर्यप्रकाश, सीएमएस
खरीदनी पड़ रही ऑक्सीजन
प्लांट से जिला अस्पताल व इमरजेंसी वार्ड तक ऑक्सीजन पाइप लाइन बिछाने का प्रस्ताव शासन में अटका है। लगभग 1.25 करोड़ रुपये से पाइप लाइन बिछाई जानी है। फिलहाल यहां ऑक्सीजन की सप्लाई सिलिंडर के माध्यम से की जा रही है। इसके लिए हर महीने बाहर से सिलिंडर रिफिल कराए जाते हैं, जिस पर अस्पताल को 50 से 60 हजार रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
