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नाम का कलंक : रूपवार तवायफ को देवपुर रखने की मांग, पहचान से होती है शर्मिंदगी; अनोखा है गांव का इतिहास

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sat, 31 Jan 2026 08:04 PM IST
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सार

UP News: बलिया जिले के रूपवार तवायफ के ग्रामीण अपने गांव के नाम को लेकर शर्मिंदगी महसूस करते हैं। बताया कि दशकों से इसका नाम बदलने की मांग की जा रही है लेकिन सुनवाई नहीं हुई।

Demand to keep courtesan Rupwar in Devpur feels ashamed of identity discussion going on for decades
गांव का नाम बदलने की मांग। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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Ballia News: जनपद का एक ऐसा गांव है जो विकास, संसाधन या बुनियादी सुविधाओं की कमी से नहीं, बल्कि अपने नाम के कारण सामाजिक तिरस्कार और मानसिक पीड़ा झेल रहा है। पंदह ब्लॉक की ग्राम पंचायत खड़सरा के पुरवा “रूपवार तवायफ” के ग्रामीण दशकों से इस नाम को बदलने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला है। गांव के लोगों का कहना है कि नाम की वजह से महिलाओं को सामाजिक संदेह, युवाओं को उपहास और बुजुर्गों को अपमान का सामना करना पड़ता है।

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अंग्रेजी दौर की देन बना स्थायी कलंक
जनपद मुख्यालय से करीब 21 किलोमीटर दूर स्थित इस पुरवा में लगभग 800 मतदाता हैं। ग्रामीणों के अनुसार अंग्रेजी शासनकाल में इस क्षेत्र को अय्याशी का केंद्र बनाया गया था। बुजुर्ग बताते हैं कि उस दौर में करीब 400 तवायफों को लगभग 88 एकड़ जमीन देकर यहां बसाया गया था, जहां शाम होते ही अंग्रेज अफसरों का जमावड़ा लगता था। अंग्रेजों के जाने के बाद व्यवस्था बदली, लेकिन नाम और उससे जुड़ा कलंक गांव के साथ चिपका रह गया।

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सिकंदर लोदी से भी जुड़ी कहानी
कुछ ग्रामीण इस नाम का संबंध सिकंदर लोदी के शासनकाल से भी जोड़ते हैं। उनका कहना है कि सिकंदरपुर क्षेत्र उस समय बड़ी छावनी था। इस इलाके में भी दरबारी सभाएं, नृत्य-संगीत और शायरी के आयोजन होते थे। समय के साथ यह इलाका उसी पहचान से जाना जाने लगा। करीब 142 बीघा में फैला यह पुरवा आज भी उसी नाम से दर्ज है।

महिलाओं और युवाओं को सबसे ज्यादा परेशानी
ग्रामीणों का कहना है कि गांव के नाम में जुड़े एक शब्द की वजह से सबसे अधिक शर्मिंदगी महिलाओं को उठानी पड़ती है। जब वे नौकरी या पढ़ाई के सिलसिले में बाहर जाती हैं और पहचान पत्र में गांव का नाम दर्ज होता है, तो लोग गलत नजर से देखते हैं। कई बार किराए पर कमरा लेने में भी दिक्कत आती है। युवा पीढ़ी भी इस पहचान से बचने के लिए अपने गांव का नाम बताने से कतराती है और ग्राम पंचायत का नाम बताकर काम चलाती है। उनका कहना है कि इससे सामाजिक छवि के साथ-साथ आर्थिक अवसर भी प्रभावित होते हैं।

अपने गांव का नाम लेने में भी शर्म आती है
गांव के बुजुर्ग पंचदेव यादव कहते हैं कि अपने ही गांव का नाम बताने में शर्म महसूस होती है। लोग नाम सुनकर हंसते हैं और मजाक उड़ाते हैं। वोटर आईडी से लेकर अन्य सरकारी अभिलेखों तक में यही नाम दर्ज है, जो हर बार अपमान का अहसास कराता है। उनका कहना है कि जब बड़े शहरों और जिलों के नाम बदले जा सकते हैं तो उनके गांव की मांग क्यों अनसुनी है।

नाम बदलने को लेकर लगातार पत्राचार
पूर्व प्रधान प्रतिनिधि राजदेव चौधरी ने बताया कि वर्ष 2023 से सरकारी दस्तावेजों से “तवायफ” शब्द हटाने के लिए प्रयास जारी है। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, राज्यपाल और राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव तक को पत्र भेजा गया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीणों का कहना है कि बेटा-बेटी का रिश्ता तय करते समय गांव का नाम बताना सबसे कठिन क्षण होता है। सामाजिक पीड़ा को शब्दों में बयां करना मुश्किल है।

“देवपुर” नाम रखने का प्रस्ताव
पूर्व प्रधान राजदेव चौधरी ने गांव का नया नाम “देवपुर” रखने का प्रस्ताव दिया है, ताकि ग्रामीण सम्मान के साथ अपनी पहचान बता सकें। प्रधान प्रतिनिधि पीयूष गुप्ता का कहना है कि तहसील से लेकर जिला स्तर तक कई बार प्रयास किए गए, लेकिन अब तक सिर्फ आश्वासन ही मिला है। ग्रामीण आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि एक दिन उनके गांव को नाम के कलंक से मुक्ति मिलेगी।

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