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राष्ट्रमंडल खेलों की कांस्य पदक विजेता सीमा कालीरामण का भिवानी पहुंचने पर हुआ स्वागत
भिवानी। ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में महिला डिस्कस थ्रो चक्का फेंक स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन करने वाली एथलीट सीमा कालीरामण के भिवानी पहुंचने पर खेल प्रेमियों व जिलावासियों ने स्वागत किया। इस अवसर पर ढोल-नगाड़ों के साथ एक विशाल विजय जुलूस निकाला गया, जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक, युवा और खेलप्रेमी शामिल हुए। भिवानी आगमन पर अपनी इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर खुशी जाहिर करते हुए सीमा ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करना और पदक जीतना उनके लिए गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि अब उनका मुख्य लक्ष्य आगामी ओलंपिक खेलों में अपने पदक का रंग बदलकर देश के लिए स्वर्ण हासिल करना है। पिता की प्रेरणा और स्कूल के दिनों से शुरुआत अपनी सफलता के पीछे के सफर और संघर्ष साझा करते हुए सीमा ने बताया कि किसी भी खिलाड़ी की सफलता के पीछे अनगिनत बलिदान और कड़ी मेहनत छिपी होती है। उन्होंने कहा कि उनके खेल जीवन के सबसे बड़े प्रेरणास्रोत उनके पिता रहे हैं, जो खुद भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हैं और बास्केटबॉल, जैवलिन तथा हर्डल के बेहतरीन खिलाड़ी रहे हैं। सीमा के खेल के सफर की शुरुआत स्कूली दिनों से हुई, जहां उनकी पीटीआई शिक्षिका सुनीता ने उनके अंदर डिस्कस थ्रो की प्रतिभा को पहचाना। इसके बाद कोच वेद प्रकाश के मार्गदर्शन में उन्होंने बुनियादी तकनीक सीखी और इटावा में आयोजित अपने पहले नेशनल अंडर-14 मुकाबले में नया मीट रिकॉर्ड कायम किया। गंभीर बीमारी और मातृत्व के बाद की वापसी की कठिन राह अपने जीवन के सबसे कठिन दौर का जिक्र करते हुए सीमा ने बताया कि विवाह और बेटे रुद्र के जन्म के दौरान उन्हें गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा। गर्भावस्था के दौरान ही उन्हें अर्थराइटिस गठिया के लक्षण उभरने लगे थे, जिससे उनके कंधे और कूल्हे जाम फ्रोजन हो जाते थे। डिलीवरी के बाद स्थिति इतनी बिगड़ गई कि जोड़ों के भयंकर दर्द के कारण उनका चलना-फिरना तक दुभर हो गया था और वह अपने मासूम बच्चे को गोद में उठाने में भी असमर्थ थीं। चिकित्सकों ने भी इस बीमारी को पूरी तरह ठीक न होने और केवल स्टेरॉयड के जरिए नियंत्रित रखने की सलाह दी थी। पति का साथ और अटूट आत्मविश्वास शारीरिक और मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण इस दौर में उनके पति पूर्व नेशनल डिस्कस थ्रोअर ने उनका हौसला बढ़ाया और उन्हें मैदान में दोबारा उतरने के लिए प्रेरित किया। सीमा ने बताया कि शुरुआत बेहद निराशाजनक थी। जो सीमा कभी नेशनल रिकॉर्ड बनाती थीं, उनसे 15 मीटर दूर भी डिस्कस नहीं फेंक पा रही थी। उस वक्त हताश होकर वह रोने लगीं, लेकिन उनके पति ने हौसला देते हुए कहा कि जिंदगी में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, बस प्रयास जारी रखना जरूरी है। सीमा का मानना है कि उनकी इस मजबूत वापसी की सबसे बड़ी ताकत उनका आत्मविश्वास और कड़ा अनुशासन रहा। दोनों ने अभ्यास को लेकर एक सख्त दिनचर्या का पालन किया। इसी लगन, समर्पण और खुद को लगातार पुश करने के जज्बे के बल पर सीमा ने न केवल वापसी की, बल्कि राष्ट्रमंडल में कांस्य पदक जीतकर देश का मान बढ़ाया।
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