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मेरा गांव मेरी शान: चाचा-भतीजे ने 268 साल पहले बसाया था हिसार का गंगवा गांव, जानें क्या है इतिहास?
शहर से सटे गांव गंगवा का इतिहास काफी पुराना है। चाचा-भतीजे ने 268 साल पहले इस गांव को बसाया था। वहीं गूंगे चाचा के कारण इस गांव का नाम गंगवा पड़ा। यही नहीं जिस जांटी के पेड़ के नीचे चाचा-भतीजे ने बैठकर विश्राम किया था, ग्रामीणों ने उस पेड़ को आज तक संजोकर रखा हुआ है।
ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 1758 (विक्रमी संवत् 1815) में पंघाल गौत्र के चाचा हुंदाराम और भतीजा इंद्राज कलायत से यहां ऊंट गाड़ी पर आए थे। यहां उन्होंने अपनी ऊंट गाड़ी को एक जांटी के पेड़ के नीचे खड़ा किया और अपनी गाय को भी यहां विश्राम करवाया था। उस समय यहां बंजर जमीन थी और यहां बहुत बड़ा जंगल था। चाचा-भतीजे ने परिश्रम से जंगल को साफ किया और जमीन को खेती लायक बनाया।
हुंदाराम बोलने में असमर्थ थे। इस कारण इस गांव को गूंगा आला गांव के नाम से जाना जाता था। समय बदलने के साथ नाम में भी बदलाव आया। फिर से गंगुआ और गंगुवा के नाम से जाना जाने लगा। आखिर में इसका नाम गंगवा पड़ा। आज इस गांव की आबादी करीब 11 हजार है और इस गांव में करीब 7 हजार मतदाता है।
ग्रामीणों ने अपनी प्राचीन धरोहरों को काफी सहेजकर रखा हुआ है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वह जांटी का पेड़ आज भी सुरक्षित है। पंघाल गौत्र की पीढि़यों ने इस पेड़ को संभाल कर रखा हुआ है। इस पेड़ के अलावा उस समय की पंचपीर की मजार, मस्जिद और एक कुआं आज भी गांव में मौजूद है और गंगवा की प्राचीन गाथा का बखान कर रहे हैं। गांव में वह बैठक भी मौजूद है जहां गांव की सबसे पहली पंचायत हुई थी।
गांव में 150 साल पुराना बाबा रामदेव का मंदिर है। बाबा ब्रह्मचारी यहां तपस्या करते थे। उन्होंने इस मंदिर की स्थापना की थी। हर चांदनी चौथ पर उनकी याद में मंदिर में भंडारे का आयोजन किया जाता है। साथ ही मंदिर में साल में दो बार बाबा रामेदव का मेला लगता है। गांव में गुरु जंभेश्वर भगवान का भी मंदिर है। ग्रामीणों की इस मंदिर में भी काफी आस्था है। इसके अलावा गांव में शीतला मंदिर भी है जिसमें ग्रामीण पूजा करते हैं।
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