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My Village, My Pride: The Soil of the Heroes of Kiloi, Rohtak, Has Offered the Nation the Ultimate Sacrifice.
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मेरा गांव मेरी शान: रोहतक के किलोई के वीरों की माटी ने दिया देश को सर्वोच्च बलिदान
रोहतक ब्यूरो
Updated Fri, 01 May 2026 03:34 PM IST
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वीर सपूतों और स्वतंत्रता सेनानियों की भूमि रहा किलोई माटी ने न केवल अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोहा लिया बल्कि देश की आजादी के बाद सीमाओं की सुरक्षा में सर्वोच्च बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटी।
किलोई गांव के कण-कण में देशभक्ति की लौ जलती रहती है। ग्रामीणों के अनुसार, गांव में 1500 से अधिक सैनिक परिवार हैं। फिलहाल भी 1200 ग्रामीण व युवा तीनों सेनाओं में तैनात है। गांव के सपूत शहीद साधूराम ने 1999 के कारगिल युद्ध में दुश्मन के दांत खट्टे करते हुए अपनी शहादत दी थी। बेटे बलवान बताते हैं कि कारगिल युद्ध के साधूराम सिपाही पद पर रहकर 31 दिसंबर 1999 में देश के लिए अपना बलिदान दिया। 2 जनवरी 2000 को राजकीय सम्मान के साथ गांव में पार्थिव शरीर पहुंचा था।
वहीं, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में गांव के कैप्टन रामकिशन ने अदम्य साहस दिखाते हुए रणक्षेत्र में जौहर दिखाया था। उनके पराक्रम ने दुश्मन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। वह सही सलामत सेवाएं पूरी कर 1994 में सेवानिवृत होकर घर लौटे थे। सेना से मेडल भी मिला। गांव के अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान श्रीराम ने तहसीलदार के पद रहे। उन्होंने अंग्रेजों को कार्यप्रणाली के अनुसार कार्य किया।
सुभाष चंद्र बोस की सेना में रहे दीवान सिंह
किलोई खास निवासी जयसिंह ने बताया कि पिता दीवान सिंह सुभाष चंद्र बोस की सेना में रहे। सुभाष चंद्र बोस की फौज को ज्वाइन किया। देश की आजादी और संघर्ष के लिए हर संभव प्रयास किया। जापान के साथ रोक की लड़ाई में गए लेकिन करीब 7 साल तक घर में नहीं पहुंचे। गांव वालों को लगा था कि उनका निधन और गया। क्षेत्र के प्रशासनिक अधिकारी और डीसी भी सांत्वना और आर्थिक सहायता देने के लिए पहुंचे। दीवान से पिता ज्ञानी राम ने बेटे को सही सलाम लाने के लिए गुहार लगाई। हालांकि, रोक लड़ाई के बाद करीब 7 बाद दीवान सुरक्षित घर लौटे थे। उनको सुभाष चंद्र बोस की सेना के मेडल भी मिले हैं।
किलोई में 1500 से अधिक सैनिक परिवार और उनके परिजन हैं। मेरे पिता करतार सिंह भी 1971 की लड़ाई में अपना योगदान दे चुके हैं। उन्होंने आर्मी रहकर देश के लिए सेवा की है। गांव के लड़कियों वाले स्कूल के नाम भी शहीद के नाम पर रखा गया है। -विजय कुमार, सरपंच किलोई खास।
मेरे भाई शहीद नायक साधू राम 1988 में उन्होंने सेना को ज्वाइन किया था। दिसंबर 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मनों के बीच मुठभेड़ में शहीद हो गए। परिवार से कोई भाई के अलावा कोई सैनिक नहीं है। - बलवान, किलोई।
पति राम किशन ने 1994 तक सेना में कैप्टन के रूप में सेवाएं दी। सेना में रहते हुए कभी डर नहीं हुआ बल्कि गर्व हुआ कि देश के लिए सीमा पर तैनात हैं। 1971 की लड़ाई में उन्होंने अपना योगदान दिया। -शांति, किलोई।
पिता दीवान सिंह स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं। सुभाष चंद्र बोस के साथ भी आजाद हिंद फौज में रहे। एक समय ऐसा था कि वो 7 साल घर भी लौट पाए थे। लोगों को लगा कि उनका निधन हो गया लेकिन ऐसा नहीं था। -जयसिंह, किलोई।
मेरे दादा जी को मैंने 4 साल की उम्र तक ही देखा है। पिता अशोक बताया करते है दादा राम किशन सेना में कैप्टन रहे। उन्होंने सेनाओं का प्रतिनिधित्व किया। आज उनके परिवार में दो बेटे हैं। -अजय, किलोई।
मेरे दादा श्रीराम ब्रिटिश काल में तहसीलदार रहे हैं। गांव में दादा सबसे पहले तहसीलदार माने जाते हैं। उन्होंने पहले उत्तर प्रदेश के मेनचनाबाद में भी सेवाएं दी, बाद में रोहतक में भी काम किया। -धर्मबीर हुड्डा, किलोई।
किलोई गांव में शुरू से ही वीरों की धरती रहा है। अभी भी खेलों माध्यम से अनेक ग्रामीण युवा आर्मी में शामिल हो रहे हैं। शहीद नफे सिंह राठी जैसे वीरों को गांव हमेशा याद करता है। -सुभाष चंद्र, किलोई।
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