भारतीय सनातन धर्म परंपरा में गेर चल समारोह को साहस, शौर्य और विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। धार्मिक नगरी उज्जैन में यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। रंगपंचमी और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा) के अवसर पर ब्राह्मण समाज द्वारा गेर चल समारोह निकाले जाते हैं, जिनमें ध्वज-निशान के साथ शस्त्र प्रदर्शन किया जाता है। इस वर्ष 8 मार्च को रंगपंचमी से लेकर 19 अप्रैल गुड़ी पड़वा तक शहर में विभिन्न स्थानों से भव्य गेर निकाली जाएगी।
महाकाल मंदिर के पुजारी पंडित महेश शर्मा ने बताया कि मालवा की लोक परंपरा में इसे ‘गैर’ कहा जाता है। यह शौर्य और पराक्रम का प्रतीक है, जिसमें राजसी परंपरा के प्रतीक ध्वज निकाले जाते हैं। उन्होंने बताया कि करीब 2100 वर्ष पहले सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को परास्त करने के बाद राज्योत्सव मनाने की परंपरा शुरू की थी।
बाद में राजा-महाराजाओं ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और मराठा काल में यह और अधिक समृद्ध हुई। महाकाल, सिंहपुरी, कार्तिक चौक, भागसीपुरा और अब्दालपुरा जैसे मोहल्लों की गेर उसी शौर्य और पराक्रम की प्रतीक मानी जाती है। इसके उल्लेख लोककथाओं और किवदंतियों में भी मिलते हैं।
जानिए कब निकलेगी गेर
महाकाल मंदिर की गेर
ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर से रंगपंचमी के दिन शाम 7 बजे वीरभद्र चल समारोह के रूप में गेर निकलेगी। बैंड-बाजों के साथ बाबा वीरभद्र का ध्वज निकाला जाएगा। इसमें विभिन्न राज्यों के वाद्य एवं नृत्य दल, हाथी-घोड़े और आकर्षक झांकियां शामिल होंगी।
कार्तिक चौक की गेर
कार्तिक चौक से रंगपंचमी के दिन गुर्जर गौड़ ब्राह्मण समाज की गेर निकलेगी। शाम 7 बजे तोपतोड़ भैरव मंदिर में ध्वज-निशान का पूजन किया जाएगा। इसके बाद ढोल-नगाड़ों के साथ समाजजन ध्वज लेकर चल समारोह में निकलेंगे और समाज के घरों पर प्रदर्शन के लिए स्थापित करेंगे। इसे छोटी गेर कहा जाता है।
सिंहपुरी की गेर
सिंहपुरी के गुर्जर गौड़ ब्राह्मण समाज द्वारा रंगपंचमी पर दो गेर निकाली जाती हैं। पहली गेर दोपहर 12 बजे निकलती है, जिसमें समाजजन ढोल-नगाड़ों के साथ महाकाल मंदिर पहुंचते हैं। वहां से मंदिर समिति उन्हें ध्वज प्रदान करती है और गेर वापस सिंहपुरी लौटती है। इसी दिन शाम 7 बजे दूसरी गेर निकाली जाती है। समाजजन आताल-पाताल भैरव मंदिर में ध्वज का पूजन कर गेर निकालते हैं।
भागसीपुरा की गेर
भागसीपुरा से औदिच्य ब्राह्मण समाज की पहली गेर रंगपंचमी के दिन निकाली जाती है। समाजजन श्री आनंद भैरव मंदिर में ध्वज-निशान का पूजन कर चल समारोह निकालते हैं।
पानदरीबा की गेर
मराठा समाज की गेर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा) के दिन पानदरीबा स्थित गणेश मंदिर से निकलेगी। यह चल समारोह शिप्रा तट तक जाएगा, जहां ध्वज-निशान का पूजन किया जाएगा। इसके बाद गेर शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए पुनः गणेश मंदिर पहुंचेगी।
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बड़ी और छोटी गेर की परंपरा
चैत्र कृष्ण चतुर्दशी पर बड़ी गेर
परंपरा के अनुसार समाज की बड़ी गेर गुड़ी पड़वा से दो दिन पहले चैत्र कृष्ण चतुर्दशी को निकाली जाती है। इस दौरान शाही ठाठ-बाट के साथ बैंड-बाजे, हाथी-घोड़े और विभिन्न धार्मिक झांकियों के साथ चल समारोह निकाला जाता है। भगवान तोपतोड़ भैरव का रथ इसमें विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है।
गुड़ी पड़वा पर बड़ी गेर
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन शाम 7 बजे आताल-पाताल भैरव मंदिर में ध्वज-निशान का पूजन किया जाएगा। इसके बाद गेर चल समारोह नगर भ्रमण के लिए निकलेगा। इस चल समारोह में 11 ध्वज-निशान, 21 ढोल, बैंड-बाजे, घोड़े-बग्घी और भगवान का रथ शामिल रहेगा।