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अमेठी में क्याधू नदी तट पर आज भी जीवित है हजारों वर्षों की पौराणिक स्मृति
अमेठी में मुसाफिरखाना के गुन्नौर गांव में क्याधू नदी के शांत तट पर स्थित देवर्षि नारद धाम आज भी आस्था, इतिहास और पौराणिक चेतना का जीवंत प्रतीक बना हुआ है। समय की धूल से अछूता यह धाम न केवल धार्मिक श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को भी सहेजे हुए है। यहां स्थापित स्वयंभू अर्धनारीश्वर शिवलिंग श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का आधार माना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार असुरराज हिरण्यकश्यप की पत्नी क्याधू को इंद्रदेव आकाश मार्ग से ले जा रहे थे। इसी दौरान देवर्षि नारद ने इंद्र को यह बताया कि क्याधू के गर्भ में पल रहा शिशु विष्णु भक्ति में लीन रहेगा। इस जानकारी के बाद क्याधू को आश्रम क्षेत्र के समीप छोड़ दिया गया। मान्यता है कि इसी कालखंड में देवर्षि नारद ने यहां स्थित स्वयंभू अर्धनारीश्वर शिवलिंग की आराधना की थी।
उस समय यह क्षेत्र गुरुठौर के नाम से जाना जाता था, जो कालांतर में गुन्नौर कहलाने लगा। पास बहने वाली क्याधू नदी भी अब कादू नाला के नाम से जानी जाती है। लोक मान्यताओं के अनुसार गुरुठौर में आश्रय लेने के बाद क्याधू ने नेवादा क्षेत्र में कठोर तप किया। कहा जाता है कि देवी ने प्रसन्न होकर उन्हें मृत्यु हरण का वरदान प्रदान किया। आज वही स्थल मूर्तिहीन भवानी के रूप में श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा हुआ है।
देवर्षि नारद धाम परिसर में वट और पीपल के प्राचीन वृक्षों के समीप खंडित मूर्तियां आज भी दिखाई देती हैं। ये पुरातात्विक अवशेष इस स्थल के प्राचीन और गौरवशाली इतिहास की साक्षी माने जाते हैं।
श्रावण मास और महाशिवरात्रि के अवसर पर देवर्षि नारद धाम में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। श्रद्धालु क्याधू नदी से जल लेकर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। इस दौरान विशेष पूजा, रुद्राभिषेक और भंडारे का आयोजन होता है, जिससे पूरा क्षेत्र हर-हर महादेव के जयघोष से गूंज उठता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर रह चुके स्वामी रामानुजाचार्य बताते हैं कि वर्ष 1995 में उनका यहां प्रथम आगमन हुआ था। अगले वर्ष देवर्षि नारद की प्रतिमा की स्थापना कराई गई। जीर्णोद्धार के दौरान यहां कई प्राचीन प्रतिमाएं भी प्राप्त हुईं। उनका मानना है कि यह धाम साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा से जुड़ा विशेष स्थल है। गांव के पूर्व प्रधान गंगेश सिंह के अनुसार रामानुजाचार्य के आगमन के बाद इस धाम को व्यापक पहचान मिली।
श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर देवर्षि नारद धाम में दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं। क्याधू नदी से जल लेकर शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह स्थल केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं, बल्कि एक रहस्यमय और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण माना जाता है। क्याधू नदी का यह तट आज भी पौराणिक चेतना और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखे हुए है।
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