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कहीं पैदल तो कहीं साइकिल से और कहीं जानवरों की तरह वाहनों में लदे मजदूरों में सिर्फ घर वापसी की होड़

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 20 May 2020 12:08 AM IST
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Somewhere on the bicycle and somewhere like animals, the workers who are loaded in vehicles, only the race to return home
prayagraj news - फोटो : prayagraj
 सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करते हुए प्रवासी मजदूरों के आने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। कोई परिवार के साथ तपती धूप में पैदल ही चला आ रहा है तो कोई साइकिल पर गृहस्थी लादे जैसे-तैसे बस घर पहुंच जाना चाहता है। बीमार, थके बच्चे चलते-चलते ऊंघने लगते हैं लेकिन, रुकता कोई नहीं। ऐसे मजदूरों की संख्या भी बड़ी है जो मुंबई, नासिक, हैदराबाद, गाजियाबाद, सूरत आदि शहरों से ट्रकों और टेंपो में जानवरों की तरह ठूंसे चले आ रहे हैं।
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हालात के थपेड़ों को सहते आगे बढ़ते इन मजदूरों को कहीं से भी कोई राहत नहीं मिली। पूछने पर कहते हैं, रास्ते में कई जगह उनकी जांच तो की गई लेकिन, भूख से बेहाल उनके बच्चों को किसी ने दूध और खाने के लिए नहीं पूछा।
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prayagraj news - फोटो : prayagraj
मुंबई से सैकड़ों प्रवासी मजदूर मंगलवार को प्रयागराज पहुंचे। घर वापसी का इंतजार करते थक चुके हंडिया, कोरांव, सोरांव और पिपरी के मजदूरों की आंखों में मंजिल करीब आने पर एक चमक सी दौड़ जाती है। जैसे पीड़ा और बेबसी के अंतहीन सफर को विराम लग गया हो। प्रवासियों ने अमर उजाला से अपने संघर्षों की गाथा साझा की। पूछने पर कई मजदूरों  की आंखों से आंसू छलक पड़े।
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मुंबई के ठाणे में रिक्शा चलाकर जीवनयापन करने वाले हंडिया के बब्लू सिंह सफर की कड़वी यादों को बयां करते हुए रो ही पड़े। पत्नी व छह बच्चों का कुनबा लेकर उसने किस तरह लॉकडाउन में मुंबई में बिताया और कितने संघर्षों के बाद वह घर के नजदीक पहुंचे, यह बताते हुए गला बार-बार रूंध गया। बब्लू ने बताया कि गोरेगांव, नासिक से लेकर सिविल लाइंस के ब्वायज हाईस्कूल तक छह जगह कोरोना की जांच तो हुई, लेकिन उसके तीन बीमार बच्चों आठ साल की सोनम, पांच वर्ष की अनामिका और चार साल के राज को न कहीं दूध मिला न दवा।
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prayagraj news - फोटो : prayagraj
बताया कि लॉकडाउन के बाद जब पैसे खत्म हो गए और काम बंद हो गया, तब बच्चों की जान बचाने की चिंता बढ़ गई। अब उसे लगने लगा था कि यहां कोरोना की चपेट में आने से बच भी गए, तो भूखों रहकर बिना मौत मर जाएंगे। ऐसे में किसी तरह घर लौटने के अलावा कोई चार नहीं था। पैसे खत्म हो गए थे। रास्ते में कई-कई दिनों तक भूखा रहना पड़ा।
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