सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करते हुए प्रवासी मजदूरों के आने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। कोई परिवार के साथ तपती धूप में पैदल ही चला आ रहा है तो कोई साइकिल पर गृहस्थी लादे जैसे-तैसे बस घर पहुंच जाना चाहता है। बीमार, थके बच्चे चलते-चलते ऊंघने लगते हैं लेकिन, रुकता कोई नहीं। ऐसे मजदूरों की संख्या भी बड़ी है जो मुंबई, नासिक, हैदराबाद, गाजियाबाद, सूरत आदि शहरों से ट्रकों और टेंपो में जानवरों की तरह ठूंसे चले आ रहे हैं।
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हालात के थपेड़ों को सहते आगे बढ़ते इन मजदूरों को कहीं से भी कोई राहत नहीं मिली। पूछने पर कहते हैं, रास्ते में कई जगह उनकी जांच तो की गई लेकिन, भूख से बेहाल उनके बच्चों को किसी ने दूध और खाने के लिए नहीं पूछा।
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मुंबई से सैकड़ों प्रवासी मजदूर मंगलवार को प्रयागराज पहुंचे। घर वापसी का इंतजार करते थक चुके हंडिया, कोरांव, सोरांव और पिपरी के मजदूरों की आंखों में मंजिल करीब आने पर एक चमक सी दौड़ जाती है। जैसे पीड़ा और बेबसी के अंतहीन सफर को विराम लग गया हो। प्रवासियों ने अमर उजाला से अपने संघर्षों की गाथा साझा की। पूछने पर कई मजदूरों की आंखों से आंसू छलक पड़े।
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मुंबई के ठाणे में रिक्शा चलाकर जीवनयापन करने वाले हंडिया के बब्लू सिंह सफर की कड़वी यादों को बयां करते हुए रो ही पड़े। पत्नी व छह बच्चों का कुनबा लेकर उसने किस तरह लॉकडाउन में मुंबई में बिताया और कितने संघर्षों के बाद वह घर के नजदीक पहुंचे, यह बताते हुए गला बार-बार रूंध गया। बब्लू ने बताया कि गोरेगांव, नासिक से लेकर सिविल लाइंस के ब्वायज हाईस्कूल तक छह जगह कोरोना की जांच तो हुई, लेकिन उसके तीन बीमार बच्चों आठ साल की सोनम, पांच वर्ष की अनामिका और चार साल के राज को न कहीं दूध मिला न दवा।
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बताया कि लॉकडाउन के बाद जब पैसे खत्म हो गए और काम बंद हो गया, तब बच्चों की जान बचाने की चिंता बढ़ गई। अब उसे लगने लगा था कि यहां कोरोना की चपेट में आने से बच भी गए, तो भूखों रहकर बिना मौत मर जाएंगे। ऐसे में किसी तरह घर लौटने के अलावा कोई चार नहीं था। पैसे खत्म हो गए थे। रास्ते में कई-कई दिनों तक भूखा रहना पड़ा।