{"_id":"6a513d9e5177c9986700b583","slug":"video-paniyala-fruit-on-the-verge-of-extinction-2026-07-11","type":"video","status":"publish","title_hn":"पनियाला फल विलुप्त होने की कगार पर।","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जिले की पहचान माने जाने वाले दुर्लभ फल पनियाला को विशिष्टता के कारण जीआई टैग तो मिल गया लेकिन इसके संरक्षण की दिशा में अब तक ठोस पहल नहीं हो सकी है। हर साल वन विभाग बड़े पैमाने पर पौधरोपण अभियान चलाता है, मगर पनियाला के पौधों को प्राथमिकता नहीं दी जाती। यही कारण है कि कभी शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मिलने वाला यह फल अब विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गया है। करीब 15 वर्ष पहले लच्छीपुर, रामनगर, पचपेड़वा और नकहा स्टेशन तक पनियाला के बगीचे हुआ करते थे। बढ़ती आबादी, आवासीय निर्माण और पेड़ों की कटाई के कारण अधिकांश बगीचे खत्म हो गए। वर्तमान में इन इलाकों में केवल दस-बीस पेड़ ही बचे हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार पूरे जिले में पनियाला के पेड़ों की संख्या 200 से भी कम रह गई है। सबसे बड़ी बात यह है कि वन विभाग हर वर्ष लाखों पौधे लगाता है, लेकिन पौधरोपण सूची में पनियाला का नाम शायद ही दिखाई देता है। यदि जीआई टैग प्राप्त स्थानीय प्रजाति को नियमित रूप से रोपा जाता तो इसकी संख्या बढ़ाई जा सकती थी।
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