एक समय अपने सुनियोजित ढांचे और साफ-सुथरी सड़कों के लिए पहचाने जाने वाला गुलाबी नगर जयपुर इन दिनों बदहाल बुनियादी ढांचे की मार झेल रहा है। राजधानी की सड़कों की दुर्दशा और जगह-जगह हो रहे जलभराव पर राजस्थान हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जाहिर की है। मानसून की शुरुआत में ही शहर की हालत पर चिंता जताते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने संबंधित अधिकारियों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
कोर्ट ने मुख्य सचिव, नगरीय विकास विभाग (यूडीएच) के प्रमुख शासन सचिव, जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीसी) के आयुक्त और नगर निगम ग्रेटर एवं हेरिटेज के आयुक्तों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है कि हर साल शहर की यही हालत क्यों होती है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है। अदालत ने यह स्पष्ट कहा कि मानसून में सड़कों का दरकना, सीवरेज ओवरफ्लो होना और आमजन का जीवन अस्त-व्यस्त हो जाना अब कोई नई बात नहीं रही, बल्कि यह प्रशासन की विफलता का प्रमाण है।
हाईकोर्ट ने सवाल किया है कि आखिर हर साल करोड़ों के बजट के बावजूद घटिया सामग्री का इस्तेमाल क्यों हो रहा है। क्या अब तक किसी ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट किया गया? और बिना निरीक्षण के बिल पास करने वाले अफसरों की जवाबदेही क्यों नहीं तय होती? अदालत ने जनता के टैक्स के पैसे की इस तरह बर्बादी को गंभीर लापरवाही करार दिया है और निर्देश दिए हैं कि दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
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हाईकोर्ट ने अधिकारियों से चार हफ्तों के भीतर यह बताने को कहा है कि टूटी सड़कों की मरम्मत के लिए कोई समयबद्ध योजना है या नहीं। साथ ही यह भी पूछा गया है कि जलभराव और सीवरेज की समस्या का स्थायी समाधान क्या होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस बार महज औपचारिक जवाब नहीं, बल्कि ठोस कार्ययोजना और जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। न्यायालय ने चेतावनी दी है कि अब लापरवाह सिस्टम और मनमानी कार्यप्रणाली को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।