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VIDEO: कोटवाधाम: जहां सदियों से जीवित है गुरु-शिष्य परंपरा की अखंड ज्योति, लगा जमांवड़ा
संत जगजीवनदास की तपोभूमि कोटवाधाम सिर्फ एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि गुरु और शिष्य के अटूट रिश्ते की मिसाल है, जहां सदियों से श्रद्धा, समर्पण और भक्ति की परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है। हर साल गुरू पूर्णिमा पर यह परंपरा अपनी पूर्णता को छूती है, जब देश के कोने-कोने से लेकर नेपाल और भूटान तक से श्रद्धालु यहाँ जुटते हैं।
कोटवाधाम में हर गुरू पूर्णिमा पर भोर से ही लंबी कतारें लगती हैं। शिष्य गुरु की गद्दी पर मत्था टेकते हुए केवल आशीर्वाद नहीं, बल्कि गुरु परंपरा की उस अदृश्य डोर को भी थाम लेते हैं, जिसने उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ा है। यहां की मिट्टी में बसे संत जगजीवनदास के विचार आज भी लोगों को जीवन में सहनशीलता, संयम और सच्चाई की राह दिखाते हैं।
इस बार भी बड़ी गद्दी के महंत नीलेंद्र बक्श दास की अगुवाई में हुए विशाल भंडारे में हजारों श्रद्धालु उमड़े। भजन-कीर्तन की गूंज, शिष्यों के जयकारे और गुरु महिमा का बखान – सबने वातावरण को भक्तिरस से सराबोर कर दिया। श्रद्धालुओं के चेहरों पर अपार श्रद्धा और संतोष का भाव इस परंपरा की गहराई को बखूबी बयान करता रहा।
गुरु पूर्णिमा के इस पर्व पर कोटवाधाम सिर्फ धार्मिक उत्सव का केंद्र नहीं बनता, बल्कि यह अपने विशाल मेले के जरिए भी हजारों लोगों की आस्था और आजीविका का संगम स्थल बन जाता है। यहाँ प्रसाद, पूजन सामग्री, ग्रामीण हस्तशिल्प, खिलौने और मिठाइयों की हजारों दुकानें सजती हैं। लोग यहां से न केवल सामान, बल्कि अपने गुरु का आशीर्वाद और साथ ही अपने पूर्वजों की परंपरा की खुशबू भी अपने साथ ले जाते हैं।
इस मौके पर राज्यमंत्री सतीश शर्मा, जिला पंचायत अध्यक्ष राजरानी रावत और एमएलसी अंगद सिंह जैसे जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी ने भी आयोजन की गरिमा को बढ़ाया। लेकिन असली आकर्षण उन अनगिनत साधारण श्रद्धालुओं में दिखा, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर से सिर्फ अपने गुरु के दर्शन और चरणों में शीश नवाने के लिए यहाँ पहुंचे थे।
कोटवाधाम की गुरु परंपरा महज एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली वह चेतना है, जो हर साल गुरू पूर्णिमा पर नए सिरे से जाग उठती है। यही परंपरा कोटवाधाम को सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि हजारों शिष्यों के विश्वास और आस्था की जिंदा मिसाल बनाती है।
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